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Miss You Papa—-I want to be like you———–**

मुझे समझ नहीं आता क्यों, लेकिन अब जब भी मैं शीशे में खुद को देखता हूँ, तो उसमें अपने पापा की झलक दिखाई देती है। यह एक अजीब अनुभव है—पापा को मैंने सही मायनों में तब समझा जब वे मेरे साथ नहीं थे और मैं खुद पिता बन गया। बचपन में, पापा हर बच्चे के हीरो होते हैं, लेकिन मेरे लिए यह रिश्ता थोड़ा अलग था, इसलिए मैं अपने बाबा के ज्यादा करीब था। बचपन में मैंने पापा को हमेशा थोड़ी दूरी से देखा, मम्मी और बाबा की नजरों से। हमारे बचपन की कहानी पापा के संघर्ष की थी, जिसे उस समय समझ पाना मुश्किल था। पापा उन दिनों एलआईसी के एजेंट थे और अपने संघर्ष में व्यस्त रहते थे। ऐसा नहीं है कि उनका पूरा जीवन संघर्षों से भरा रहा हो; बाबा ने पापा को एक शानदार जिंदगी दी थी। पापा ने वकालत की पढ़ाई की थी, जो उनके पिता का सपना था। इलाहाबाद, जो वकीलों का शहर था, वहाँ पापा ने वकालत की पढ़ाई तो की, लेकिन कभी वकालत नहीं की। उन्होंने जीवन के शुरुआती दिनों में कई अलग-अलग करियर आजमाए—ठेकेदार, उपन्यासकार, फिल्म वितरक, फोटोग्राफर, और आखिरकार एलआईसी एजेंट बने। पापा का संघर्ष हमारे लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा है। जिस मेहनत से उन्होंने एक एलआईसी एजेंट से अधिकारी तक का सफर तय किया, वह बताने लायक नहीं है। मुझे आज भी याद है, जब उन्होंने अपनी पहली मारुति खरीदी थी—वह खुशी शब्दों में बयान करना मुश्किल है। संघर्ष के उन दिनों में, मैंने पापा को कई बार हारते हुए भी देखा, लेकिन वे हमेशा मुस्कुराते रहे और कभी हार नहीं मानी। जब उनके पास पैसे नहीं होते थे, तब भी उन्होंने कभी हमें किसी चीज के लिए मना नहीं किया। उन दिनों मुझे लगता था कि शायद पापा ने अपने जीवन की सही से योजना नहीं बनाई थी, वरना उन्हें इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। सच कहूँ तो, जब भी मैंने ‘परस्यूट ऑफ हैप्पीनेस’ फिल्म देखी, तो उसमें एलआईसी एजेंट के रूप में पापा को ही देखा, जो विजय सुपर स्कूटर पर अपने संघर्ष के दिनों में थे। उन्होंने सफलता के लिए जी-जान से मेहनत की और आखिरकार सफलता पाई। मुझे एक घटना याद है जब मैं देर रात स्टेशन से घर आ रहा था और ट्रेन बहुत लेट हो गई थी। स्टेशन पर कोई रिक्शा नजर नहीं आ रहा था। तभी एक रिक्शे वाले ने मुझे दूर से देखा और कहा, “बाबूजी, मैं आपको घर छोड़ दूंगा।” उसने मुझसे यह भी नहीं पूछा कि घर कहाँ है। मैंने उसे बताया कि मुझे कल्याणी देवी जाना है। घर पहुँचने पर उसने कहा, “पापा को बोल दीजिए कि साधू ने छोड़ दिया था।” उसने मुझे स्टेशन पर पहचान लिया था और बिना पैसे लिए चला गया। सच कहूँ तो, पापा ने शायद पैसा नहीं, इज्जत कमाई थी।