Chamatkaar
Chamatkaar (a short story)
बात 90 के दशक की होगी मैं रोज की तरह त्रिपाठी सर के यहां फिजिक्स की कोचिंग करने जा रहा था। उनके घर के पास कटघर तक पहुंच तो देखा ना जाने कितनी भीड़ जमा दिखी एक मंदिर के सामने. फिर किसी तरह से उनके घर के पास से बचते-बचाते गलियों में मैं पहुंच गया तो देखा दोस्त दिख गया। मेरे दोस्त पवन ने बताया कि आज सर की तबीयत सही नहीं है तो कोई क्लास नहीं। मैंने पूछा यार आज कुछ फर्क नहीं है यहां की गलियों में। उसने भी बोला हां कि जब वो भी आ रहा था तो देखा कि मंदिर के बाहर बहुत भीड़ है। इस समय ना तो कोई नवराते है ना ही कोई त्यौहार फिर पता नहीं क्यों इतनी भीड़ थी। तभी हमारे एक और दोस्त आ गए वाहा पे और उसने बताया कि मंदिर में गणेश जी की मूर्ति के आगे अगर दूध रखो तो दूध गायब हो जाता है मतलब की गणेश जी दूध पी रहे हैं
हम सभी को लगा कि ये तो कोई नया चमत्कार है चल के देखा जाए और हम भी कटघर के उस मंदिर में पहुंच गए। लोग बहुत ज्यादा थे भीड़ बहुत थी तो लगा कि अंदर जा पाना तो बहुत मुश्किल है और फिर साइकिल भी थी पास में। मैंने पवन से बोला कि चलो साइकिल रख के आते हैं ऐसा चमत्कार तो देखना बनता है वो भी हमारे इलाहाबाद के इस मंदिर में है। भीड़ किसी ने हमें बोला नहीं ये तो सारे मंदिर में हो रहा है और सिर्फ इलाहाबाद नहीं, बल्कि भारत में हो रहा है। अब तो थोड़ा अश्चर्य होने लगा मुझे कि ये बात पता कैसे चली लगी.उन दिनों ना तो कोई सोशल मीडिया था ना ही 24x7 आने वाले चैनल या फिर यू ट्यूब पर। समाचार पत्र आने का भी एक समय सुबह का होता था और टीवी के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन ही था। हलाकी मेट्रो सहारो मैं ज़ी टीवी और डीडी मेट्रो चैनल आ गए थे ।
अब हमें लगा कि चलो घर जाके मम्मी पापा को भी बताया जाए। घर पहुँचे तो देखा पापा की मोटर साइकिल घर के बाहर थी। पापा ने भी कहीं से सुना था और वो भी जल्दी घर आ गए कि मंदिर चला जाए। पराग दूध की सॉर्टेज हो चुकी है दूध के पैकेट महंगे मिल रहे हैं। पापा ने कहीं से जुगाड़ तो कर लिया था। भैया ने बोला कि क्यों ना घर की मूर्ति पर भी कोसिस करते हैं। घर में पूजा घर पर गणेश जी की मूर्ति की सामने चमचे से दूध रख के देखा तो कुछ हुआ नहीं। फिर लगा कि सयाद कल्याणी देवी मंदिर जाके ही देखना चाहिए।
मंदिर मैं बहोत भीड़ थे सयाद नवरात्रो से भी ज्यादा। ना जाने कैसे उन दिनों ये बातें सोशल मीडिया से भी तेज फेल हो जाती थीं। ऐसा लगा कि पूरा शहर आज मंदिर आ गया है। मंदिर के अंदर जाना तो बहुत ही मुश्किल सा लग रहा था। लेकिन चमत्कार देखना था तो फिर लग पड़े उन लाइन्स में और आख़िरकार पहुच ही गए। दूर से दिख तो यहीं रहा था कि चमचे से दूध गणेश जी की मूर्ति के अंदर जा रहा था पर हां बहुत सारा दूध बह भी रहा था। उन दिनों ये न्यूज चैनल्स के विशेषेग्य या व्हाट्स ऐप यूनिवर्सिटी के ज्ञानी नहीं थे परंतु लोकल लॉग अपना ही अपना तर्क दे रहे थे। किसी ने बोला कि धरती एक ऐसा एंगल पे आ गई है कि मूर्तियों में कुछ हो गया है। किसी ने बोला कि प्रलय आने वाली है और ना जाने क्या क्या।
पर हम बच्चों के लिए तो बिना त्यौहार का एक मेला सा हो गया और लौटे वक्त पापा ने सबको ठाकुर की चाट खिलाई। सब ही खुश थे क्योंकि बिना त्यौहार के एक त्यौहार हो गया था शहर में।
