Train Journey
कल से दिवाली की छुटियाँ शुरू होने वाली थी शाम को ट्रेन से घर जाना था से और अभी ऑफिस मैं दिवाली फक्शन चल रहा था . एथनिक ड्रेस के नाम पे भाई की शादी के कुर्ते को पहन लिया था वैसे तो अच्छा ही लग रहा था पर उसमे वॉलेट मोबाइल कीस रखना मुश्किल हो रहा था. ऑनलाइन रिजर्वेशन करवाया था और 3-4 बार प्रिंट निकल के देख रहा था मैं कि कन्फर्म तो है न. कैब नीचे वेट कर रही थी और मुझे मैं मेरा बैग भी लेना था सिक्योरिटी रूम से. आईटी ऑफिस मैं इन त्यौहार के वीकेंड पे ऑफिस के सेक्युरिर्ति रूम एक दम रेलवे के लाकर रूम से ही होते है. अपना बैग ढूंढ पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि सारे बैग ऑलमोस्ट एक जैसे ही होते है. बड़ी मुश्किल से बैग मिला और तभी एक दोस्त का फ़ोन भी आ गया कि यार मुझे रिजर्वेशन नहीं मिला है तेरे साथ चल लूँ क्या कानपुर तक. दीवाली में रिजर्वेशन प् लेना आजकल बहुत मुश्किल होता है . मुझे मिल गया था इस बार तो बस सब को पता भी चल गया था. मैंने भी बोलै आ जाना यार एस2 मैं है . कैब तो जल्दी ही मिल गयी पर जाम बहुत था. गुडगाँव से दिल्ली वो भी दिवाली का वीकेंड जाम होना तो स्वाभाविक ही था.
छुटियों मैं ऐसा लगता है की पूरा एनसीआर खाली हो जायेगा लोगो से सबको अपने अपने घर जाना है. अक्सर प्रयागराज मैं तो आपके स्कूल के या फिर महोल्ले के दोस्त भी मिल जाते थे. जब आपका रिजर्वेशन हो तो लोग आपको जर्रूर पहचान लेते थे. खैर आखिरकार स्टेशन भी आ गया सामान तो ज्यादा नहीं था पर भीड़ बहुत थी. सोचा इलाहाबाद जाने से पहले एटीएम से कुछ रुपया निकाल लूँ नहीं तो वह कोई एटीएम मशीन ही नहीं चलती जरुरत पे. पैसे निकल के उसको पर्स में रखा और सोचा टिकट को भी इसी में रख देता हूँ सेफ रहेगा नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी अगर ये खो गया. सीट नंबर और कोच तो याद हो गए थे इतनी बार जो देखा था. फिर किसी तरह प्लेटफॉर्म पे पहुँच पाया आज ट्रैन भी 16 नंबर पे नहीं थी और 15 नंबर पर लगा दी इन लोगो ने अब सीढियों से जाना पड़ेगा और इतनी भीड़.भीड़ के बीच न जाने कैसे धीरे धीरे ट्रैन के अंदर पंहुचा. वह देखा कि ऋतुराज साहब हमारी सीट पे पहले से विराजमान थे एक और दोस्त के साथ. हमने कहा यार तुम कैसे जल्दी आ गए रास्ते मैं तो बहुत जाम था. मैंने सीट पे बैठके थोड़ी राहत भरी सांस ली. फिर घर से पापा का फ़ोन आ गया कि ट्रैन मिल गयी है न सुबह लेने आ जायेगे किस कोच में हो.अचानक ध्यान दिया पर्स तो गायब था जब से मेरे तो होश ही उड़ गए .
मैंने बोला रुकिए अभी तोड़ी देर में फ़ोन करता हूँ. फिर से सारे पॉकेट चेक किया पर कुछ नहीं और बैग भी देखा पर याद था की वॉलेट तो अभी ही रखा था कुर्ते में.
टिकट, कार्ड , ड्राइविंग लाइसेंस और रुपये सब गायब. मुझे लगा की अब तो बुरे फसे और ऑलमोस्ट रोने जैसे हालात हो गयी थी.ऋतुराज और उसका दोस्त भी परेसान की अब क्या किया जाये.मैंने सोचा एटीएम तक के रस्ते मैं जाके देखूँ पर लगा अब तो ट्रैन चलने वाली है दूसरा इतनी भीड़ मैं वॉलेट मिलना तो नामुमकिन है.
कोई तो आज मेरे पैसों से दीवाली मनायेगा. घर से दुबारा फ़ोन आया पापा ने बोला कार्ड को बंद करा दो फिलहाल तो और कॅश के बारें मैं चिन्ता न करो.ड्राइविंग लाइसेंस दोबारा बनवाना पड़ेगा और देख लो क्या क्या था उसमे.मैंने बोला रेलवे टिकट भी था. सामने बैठे हुए पैसेंजर्स ने बोलै परेसान न हो जब टी टी आएगा तब बात कर लेना.
ट्रेन चली और टी टी ग़ज़िआबाद स्टेशन तक तो नहीं आया ट्रैन मैं सभी लोग अपनी इसी तरह के पॉकेट जाने के किस्से सुना रहे थे की क्या क्या हुआ था उनके पास. मैं सुन तो रहा था सबकी कहानी पर जान अपनी ही परेसानी को ले के अटकी हुई थी
पापा का कॉल फिर से आया वो भी शायद परेशान हो रहे होंगे बोले आया क्या. मैंने कहा अभी तक तो नहीं आया. इससे पहले कभी बगैर टिकट यात्रा की नहीं थी तो कोई एक्सपीरियंस नहीं था. वैसे तो मेरा परिवार रेलवे परिवार ही था मेरे बाबा रेलवे में स्टेशन मास्टर थे और नाना जी और मामा भी रेलवे में ही थे दूर के एक फुफाजी के भाई भी रेलवे में थे पर मैं उनसे मिला नहीं था .पापा ने बोला की टी टी को फूफा जी के भाई का नाम बोल देना की उनसे बात हो गयी है.
सामने धीरे धीरे टी टी सबके टिकट देखते हुए आ रहे थे. दिवाली और छुटियों टी टी महोदय की हालत भगवान् सी होती है लोग उन से रिक्वेस्ट कर कर के सीट माँगते है और भगवान् जी का जिसपे मन आ जाये उसको ही प्रसाद देते थे.टी टी महोदय आये और हमसे पुछा टिकट हमने बोला ऑनलाइन करवाया था पर किसी ने पर्स चुरा लिया. टी टी महोदय बोलै टिकट नहीं कोई बात नहीं पर कोई आई डी है तो वो दे दो. मैंने बोला वो भी तो पर्स में था .टी टी महोदय ने कहा फिर तो फाइन लगेगा मैंने बोलै पर पैसे तो पर्स में थे.
मैंने बोला कि मेरे फूफा जी के भाई टी टी है और उनका नाम भी बताया . टी टी महोदय एकदम शांत हो गए और फिर कुछ सोचने लगे
टी टी महोदय ने बोला ठीक है मैं आता हूँ सबको निपटा के और चला गया मजेदार बात ये है की मेरी सीट पे ऋतुराज और एक दोस्त बिना रिजर्वेशन है और उनसे उसने कुछ भी नहीं पूछा. वो लोग मेरी बात पे बोल भी रहे है की इसकी कोई गलती नहीं है.
ट्रैन अलीगढ के पास आ चुकी है और टी टी महोदय अभी तक आये नहीं है. मुझे नींद भी नहीं आ रही है और घर से भी फ़ोन आ चुका है.तभी टी टी मेरी सीट पे दुबारा आते है
मुझसे बोलते है तुम बहार आना कुछ बात करनी है तुमसे. मुझे लगा पता नहीं क्या बात होगी कुछ पैसे भी नहीं है पास मैं की फाइन दे सकूँ बोल दूंगा की अब प्लीज इलाहाबाद तक ले चलिये फिर वह फाइन दे दूंगा. फिर टी टी महोदय ने पूछा की तुम कभी अपने फूफा जी के भाई से मिले हो तो मैंने थोड़ा सोचा फिर धीरे से बोला नहीं.
फिर वो हसने लगे और बोले यार कम से कम मेरा नाम तो देखा होता . मैंने ध्यान दिया उनके बैज पे तो वही नाम था जो मैंने उन्हें बताया था. उनोहने कहा मैं जानता हूँ तुम्हारे पापा को, भइया को जाओ अपनी सीट पे आराम से और कोई दिक्कत हो पैसों की तो बताना. मुझे अपने ऊपर हसीं भी आ रही थी और अजीब सा भी लगा . मैंने धीरे से बोला थैंक यू अंकल.