पतंग (शार्ट स्टोरी)

इल्लाहाबाद में खिचड़ी का इंतजार हम लोग नए साल से भी ज्यादा किया करते थे . बात उन दिनों की है जब मकर सक्रांति और वसंत दो दिन हम बच्चों के लिए बेहद ख़ास होते थे क्योंकि हमको पतंग उड़ाने पर कोई मनाही नहीं होती थी. ऐसा नहीं है की बाकि दिनों कोई प्रतिभंद था पर हां घर में मम्मी और बाबा की नजरों से बचना होता था.

अपनी पतंग उड़ा पाने का सुख बहुत ही मुश्किल है लिख पाना. बचपन में मेरा सपना था कि एक दिन मेरी पतंग बहुत दूर तक उड़ पाए. सच मैं कई रात यही सपना देखता रहता था मैं. पतंगबाजी भी एक कला है हलाकि हमारे बड़े लोगो के हिसाब से ये अच्छा काम नहीं थाऔर उन दिनों एक अछा पतंगबाज की एक अलग ही रेस्पेक्ट थी पतंगबाजो मैं . कुछ पतंगाबज बाढ़िबाज कहलाते थे. पतंगबाजी कोई आसान चीज नहीं थी पर ये बात घर में मम्मी को कौन समझाए. उनको तो पतंग का कन्ना बांधने भी नहीं आता और तो और लटाई मैं माझा सड्डी सब साथ ही मिक्स करके कहीं पे फेक देती है. कौन सम्जहये की पतंग उड़ा पाना कितना मुश्किल काम है. मेरे भाइये अच्छी पतंग उड़ा लेते थे पर हाँ पतंगबाजों की श्रेणी में नहीं थे उन लोगो का तो एक अलग ही लेवल था

मेरा सपना उन दिनों एक बड़ा पतंगबाज बनाने का नहीं बस सिर्फ अपनी पतंग उड़ा लेने का ही था. हमेशा एक डर सा लगा रहता की पतग कट न जाए या फट न जाए. इस डर के मारे मैं पतंग उड़ा भी नहीं पा रहा था. पतंग का कन्ना बांधना आसान नहीं था. घर के पास ही सदन चाचा की दुकान थी. वैसे दूकान बोलना गलत होगा क्योंकि सदन चाचा खुद ही पतंग बनाकर बेचा करते थे.

वैसे महौल्ले मैं बच्चों में उनकी ख़ास रेस्पेक्ट थी क्योंकि वो बच्चों के लिए ठोसी कस्टमाइज छोटी पतंग बना देते थे. गाइड भी कर देते की हवा इधर है तो इधर उड़ाना या कन्ना बांधने में मददत कर देते. मैंने भी उन्हीं से मदत ले ले कन्ना बँधवाने मैं..

पतंग पूरी तरह से तयार थी उड़ने के लिए. खिचड़ी या मकर सक्रांति को इल्लाहाबाद मैं आसमान पतंगों से भरा होता था. मुझे बस यही डर सता रहा था की अगर पतंग ऊपर गयी और किसी ने काट दी तो फिर क्या करूँगा.मेरे पास सिर्फ एक ही पतंग थी और सिर्फ यही एक आसरा थी जो की मेरे आसमां की ऊँची उड़ान को पूरा कर सकती थी. पर इसके खोने का डर सताने लगा तो उड़ाने का मन भी न करे. मैंने एक उपाय सोचा की क्यों न पेन से इस्पे लिख दिया जाए की ये मेरी पतंग है जिसे भी मिले प्लीज वापस कर दे और अपना पता भी लिख दिया. अब मनन को सुकून था और एक नया उत्साह भी कि चलो पतंग खोयेगी नहीं.

फिर शुरू हुआ पतंग उड़ाने का सिलसिला. हम सारे भाई छत पे पतंग उड़ने को है और मैंने भी अपनी पतंग तैयार कर ली. पतंग उडी तो बड़ी मुश्किल के बाद पर हवा तेज थी और सीधे दीवाल से टकरा गयी. aअब पतंग काफी बुरी तरह से फट गयी थी. मेरा पतंग उड़ने का सपना लगभग टूटता हुआ नजर आ रहा था. पर मैंने भी सोच लिया था की आज तो पतंग को आसमान में दूर भेजना ही है. तंग को सही करना था और उन दिनों हम लोग के पास टेप्स नहीं बल्कि लेई या गोंद का इस्तेमाल करते थे फटी पतंग को जोड़ने में. समस्या ये थी की पतंग को जोड़ तो दिया पर कागज एक साइड ज्यादा था तो वो डिस्बैलेंस से हो रही थी. फिर सदन चाचा के पास ले गया मैं तो उन्होंने एक साइड कुछ बांध सा दिया और पतंग को फिक्स कर दिया.

दुबारा फिर मैंने पतंग को उड़ाने की तयारी की और इस बार पतंग सीधे आसमान में पहुँच गयी. मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था की मेरी पतंग इतनी दूर चली गयी है. पूरी लटाई ख़तम और पतंग बहुत दूर है. ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया को बता दूँ कि देखो मेरा सपना पूरा हो गया. मुझे अपनी खुशिया का एहसास हो रहा था पर शायद बाकि लोगो को ऐसा लग रहा था ये कौन सी बड़ी बात है. फिर अचानक एक ही झटके में किसी ने मेरी पतंग को काट दिया . मेरे हाथ में डोर का कुछ हिस्सा रह गया और मेरी पतंग धीरे धीरे मेरी आँखों से दूर जा रही है. मेरी आँखों में आसूं है की मेरी पतंग अब मुझे न मिलेगी. ये पतंग उस समय तो मेरे जीवन की सारी कमाई और मेहनत्त थी मैंने ही इस पतंग का कन्ना बंधा था फट जाने पे जुड़ा था सब कुछ किया और एक झटके में मुझे छोड़ के चली गयी

काश कि इसको नहीं उड़ाया होता तो आज न जाती फिर मनन से आवाज आई की पतंग है तो कभी कभी न उड़ेगी ही आसमान में. वो पतंग थी जिसने तुम्हारे सपने को पूरा किया अब किसी दुसरे के पास है उसके सपनो के आसमान में.