लेखु जो तस्वीर बनाये उसे कोई समझ न पाये इस गाने ने ना जाने हमारे अंदर के साइंटिस्ट की जिज्ञासा को जगा दिया था ये बात उन दिनों की है जब दूरदर्शन पर लेखु सीरियल आता था। ये बात हमारे बचपन के उन दिनों की है जब सारे दोपहर हम बच्चे, नई, नई तरीकों शरारत करते रहते थे. उन दिनों सिर्फ दूरदर्शन मनोरंजन का जरिया था और उसका समय बहुत ही सीमित था। रविवार को जहां मोगली और बल्लू के इंतजार में मैं निकल जाता था वही बुधवार को चित्रहार मैं कितने गाने देख लेंगे वही याद रहता। फिर एक दिन हमारे महोल्ले में एक अजीब सा पोस्टर दिखा ज्योतोविजन का साथ मैं हमें दुकान की छत पर एक उल्टी लगी सुरक्षित छतरी जो कि रेडियो या टीवी स्टेशन पर होती थी। ज्योतोविजन नाम से दूरदर्शन जैसे तो नहीं लगा पर जिज्ञासा तो बढ़ ही गई थी। उन दिनों टीवी या वीसीआर पर ही नई फिल्में लगती थीं और उसका भी इस कदर मांग रहती थी कि लोग एक दिन में अक्सर 3 फिल्में देख लेते थे। मूवी वीसीआर पे देखना वो भी सारे परिवार या कहे सारे रिस्तेदारों के साथ एक त्यौहार सा ही होता था। कलर टीवी और वीसीआर घरो में होना अमीरी की निसानी होती थी। वीडियो कास्ट्स की लाइब्रेरीज़ की दुकान भी आम होती थी.

ज्योतिविजन वीडियो कैसेट या वीसीआर की दुकान से अलग थी तो हम सबके आकर्षण का केंद्र भी थी। समझ नहीं आया था कि असल में डिश से होता क्या होगा। फ़िर अचानक एक दिन महुल्ले मैं अपने एक पड़ोसी अंकल को अपने घर की बालकनी से कुछ तार लटकते हुए देखा। वो इलेक्ट्रिक कटिया का तार तो नहीं लगता था और इसलिए ज्योतिविजन के केबल के तार से बस टच करते हुए पड़ा सा था। उसको देख के ये तो पक्का लगा कि ये बिजली के लिए नहीं है। जिज्ञासा रोज ही बढ़ती जा रही थी, क्योंकि अंकल जी रोज ही एक निश्चित समय पर तार लटका देते थे। आख़िरकार एक दिन रहस्य से पर्दा हट गया जब उनके घर ही अचानक हम सब बच्चे पहुँच गए। हम सब बच्चों का अपना बहाना बाल आ गई है छत पे। हमें अपनी आँखों पे यकीन नहीं हुआ जब देखा कि टीवी पर नई फिल्म आ रही थी वो भी बिना किसी वीसीआर के।

अंकल ने तब बताया कि ये जो ज्योतिविजन का केबल है ये ना केबल टीवी का वायर है। अगर टीवी एंटीना का वायर उसके पास रखो तो सिग्नल कैच होता है और तुम केबल टीवी देख सकते हो। केबल टीवी हमारे समय एकदुम नई चीज थी जब चैनल बदलना ही नई बात थी। जहां 12 चैनल होते थे और उनको भी घुमाने के लिए टीवी के पास ही नोब होता था। खैर अंकल के रहस्य उद्घाटन से हम सारे बच्चे इंजीनियर बन गए अपने टीवी के पीछे से तार कनेक्ट करके केबल टीवी तक ले जाना। फिर आया नहीं आया को वो दौर की बस किसी तरह केबल टीवी से साफ साफ आ जाए। हम सब की वो भी मजबूरी थी कि पापा को ना पता चले नहीं तो सारा मनोरंजन बंद हो जाएगा। फिर कुछ दिनों बाद पापा को भी पता चला और थोड़े दिन बाद ज्योतिविजन का कनेक्शन भी लग गया।

एक सच ये है कि उसके बाद ना जाने कितने चैनल आने लगे मनोरंजन ना जाने कितना गुना हो गया पर वो जो केबल टीवी को चुप छुपा के तार फासा के देखने में वो अलग ही था

हमें याद है कि जब पहली बार केबल टीवी वो तार लगाने पर आई तो हमें लगा कि हम लोगों ने क्या चीज खोजी है। कुछ छोटा सा पुरस्कार तो मिलना ही चाहिए