Rishta
Rishta (A short Story)
काफी सालों के बाद आज इलाहाबाद के एयरपोर्ट पर आया हूं काफी बदल गया है। चेकइन की प्रक्रिया भी जल्दी हो गई और सुविधाएं काफी अच्छी लगीं। इस बार मैं अकेला ही यात्रा कर रहा था तो सारे काम भी जल्दी ही हो गए। नेहा अपने पापा के यहां बच्चों के साथ इलाहाबाद में रुक गई थी और मैंने सोचा कि हैदराबाद चला जाता हूं। हैदराबाद मैं मेरी कंपनी का इंडिया ऑफिस है तो सोचा वाहा जाके कुछ लोगो से ही मिल लूंगा। इतने साल बाद इलाहाबाद में ऐसा आना और फिर यूं ही चले जाना अजीब सा लग रहा था। वैसे तो शहर भी बदल गया है लेकिन अभी भी काफी कुछ अपनापन सा है जिसको बता पाना मुश्किल है। अचानक वेटिंग एरिया में देखा तो मुझे मेरी चाची दिखाई पड़ी। चाची से भी नाता सालों पहले ही टूट गया था। ये रिश्ते नाते भी कितने अजीब होते हैं आपको हमेशा उनकी याद आएगी जिनके साथ अपना समय गुजरा फिर एक दिन सब खत्म। आप अपने देश छोड़ के बाहर चले जाते हैं फिर कभी कभी उनको फेसबुक पर देख लिया या फिर कभी अपने माता-पिता से उनके बारे में मैं सुन लिया बस सब खत्म। एक समय चाची, बुआ, मौसी, चचेरी बहनें पडोसी कितनी जरूरी होतीं हमारी जिंदगी में। छोटी सी भी ख़ुशी हो जाने पे लगता था कि सबको पता चल जाएगा फिर किसने क्या कहा या किसको कैसा लगा यही जान लेने की इच्छा रहती थी। मुझे याद है जब हाई स्कूल का रिजल्ट आने वाला था तब हर किसी को बस यहीं जाना था कि फर्स्ट क्लास आई या नहीं। और हमें भी यही लगता है कि सबको पता चल जाएगा अगर रिजल्ट अच्छा आए तो या फिर बुरा आए तो बस ये दिन कट जाए और कोई कुछ पूछे ना। कभी सोचता हूं कि ये रिश्ते नाते भी कितनी वैल्यू रखते हैं हमारी जिंदगी में ये ना होते तो मोटिवेशन ही नहीं होता जिंदगी का।
चाची को अचानक दूर से देख के ना जाने कितनी बचपन की यादें गुजर गई दिमाग से फिर अपने आप को संभालते हुए सोचा कि दूसरी तरफ चला जाता हूं। उन्हें भी शायद देख तो लिया था पर सैयद पहचान नहीं पाई होगी। चाची का चेहरा भी काफी बदल गया था और अब शकल मैं उमर देखने लगी थी। मैंने देखा कि कहीं सीट ही नहीं मिल रही है और शायद वो मुझे पहचान नहीं पा रही है तो उनके ही बगल में मैं जाके बैठ गया। चाची की शकल और आवाज बिल्कुल मम्मी जैसी थी बस थोड़ी ऊंचाई ज्यादा थी। थोड़ी देर वहां बैठा तो ये समझ आ गया कि चाची अकेली ही यात्रा कर रही है क्योंकि कोई भी आस पास नहीं था। एक हाथ में मैगजीन ले के उसको पढ़ने की कोशिश कर रही थी। अब शायद आंखें भी कमज़ोर हो चुकी हैं। उनके बगल में एक महिला ने उनसे पूछा कि कहा जा रही है तो उन्हें बताया कि बेटे से मिलाने बेंगलुरु। मेरा मन कर रहा है कि पास जाके उनसे बात करूं हाल चाल पूछ लूं पर पता नहीं क्यों एक अजीब से डर ना रोक रखा है। बहुत साल पहले ना जाने किस बात पर आपस में बातें बंद हो गई थीं उनकी और मम्मी की। कभी-कभी सोशल नेटवर्क से पता चलता है कि उनके बच्चे कहां हैं। ज्यादातर सारे रिस्तेदारों के बच्चे शिक्षा करने के बाद इलाहाबाद से बहार ही चले गए। अब बस सुने पड़े वो घर है जहां माता-पिता का वीकेंड खुश हो जाता है जब बच्चे आ जाते हैं तो बस उन्हीं का इंतजार।
चाची को बहुत मन था कि उनका बेटा आईआईटी जाए और फिर अमेरिका। वो तो उसके किस्से कहानियां बताते हुए ना थकती कि कैसे उनके बच्चे ने आईआईटी में जाकर पढ़ाई की वो कितना तेज था। अभी भी ये बताते हैं कि उनका बेटा बेंगलुरु का मुख्य प्रबंधक है उनकी आवाज में गर्व है पर थोड़ा कम है। क्योंकि आज वो अकेली है उनके साथ कोई नहीं है। थोड़ी देर बाद उमाहेला ने पूछ लिया कि बेटा क्यों नहीं आया। चाची खामोशी थे फिर कुछ बोलने लगी
उनकी बातें सुनी थोड़ी देर में तो पता चला कि अब वो अकेली ही रहती है इलाहाबाद के घर में और बेटा बेंगलुरु में है परिवार के साथ। चाचा जी अब नहीं रहे और उनका मन नहीं लगता है बेंगलुरु में तो वो यहीं रहती है। वो कुछ दिनों के लिए बेंगलुरु जा रही है क्योंकि उनकी सेहत सही नहीं है और डॉक्टर को दिखाना है
मेरा मन काफी अधीर हो गया लगा कि जाके उनका हाल चाल पूछ लूं बात करूं पर पता नहीं हिम्मत ही नहीं हो रही थी। माँ बाप ना जाने कितना गुमान करते हैं अपने बच्चों की उपलब्धियों पे और पूर्व दिन बच्चों सब कुछ छोड़ के चले जाते हैं अपना घर बनाने।
थोड़ी देर बाद प्लेन का अनाउंसमेंट होने लगा और लोग लाइन में जाने लगे। चाची की छड़ी गिर गई थी मेरे सामने मैंने उठा कर के उनको जैसी ही पकड़ी। उनका हाथ मेरे हाथ से टच हुआ तो उन्हें अपने बेटे का नाम लिया। मैं भी हदबड़ी मैं बोल गया नहीं चाची अखिल हूं। उन्हें मेरी और देखा और ना जाने क्यों हम दोनो की ही आँखों में आसूं बह रहे थे।
हम दोनो को ही एक दूसरे के बारें में सब पता है कभी लोगो से सुनके कभी सोशल मीडिया से पर आज वो उत्साह नहीं कि अपने बारें में बता के गर्व महसूस कर पायें
आज हम दोनो का दर्द एक जैसा ही था परिवार का साथ ना होने का जो बस आसुं मैं बह रहा था
जाते-जाते वो हाथ में 100 रुपये का नोट आशीर्वाद के तरह थमा के चली गई और मैं उन्हें देखता रह गया।