हॉस्पिटल (Short Story)

हम सभी डॉक्टर के आने का का वेट कर कर रहे है की कब वो आये और बोल दे शाम को रिलीज़ कर रहे है. मेरे पापा पी जी आई हॉस्पिटल में एडमिट है और हम सारे ही लोग घर से दूर से हॉस्पिटल

के पास रहे रहे है. काफी दिन हो गया है और पापा की तबियत अब सही हो रही है. हॉस्पिटल की दुनियां आम दुनिया से बहुत अलग होती है और सच मायने मैं आपको एक बात का अहसास हो जाता है की जो सुबह शाम हम अपने घरों मैं लोगो के साथ एक बोरिंग नार्मल ज़िन्दगी एक्चुअली बहुत बेशकीमती पल है और हम उनकी कदर ही नहीं करते. . चाहे आप पेशेंट हो या उसके साथ बस हॉस्पिटल रोज मानते है की कब हमारी ज़िन्दगी फिर से वैसे ही नार्मल हो पायेगी और घर जा पाएंगे. अच्छी बात ये है की वह आपको ऐसे लोग दीखते रहेंगे और आप अपने आपको समझा पाएंगे ठीक है यार ये तो यहाँ महीने से है.

कल से दिवाली है और आज लगा कि शायद डॉक्टर बोल देंगे और हम घर जाके दीवाली मना पाएंगे पर डॉक्टर ने आके बोलै की अभी 1 हफ्ते देखना होगा. हम सभी थोड़ा सा निराश हो गए कि त्यौहार पे हॉस्पिटल में ही रुकना होगा. हम लोगो ने वार्ड पे पूजा करने की सोची और सही मैं अस्पताल का वो वार्ड के आस पास हम लोगो ने एक मिनी घर सा ही बना लिया था. अगल बगल के मरीजो और उन के घर वालों से भी दोस्ती हो गयी थी. सभी लोग एक ही तरह की समस्या से गुजर रहे थे तो हमसफ़र थे. मरीजों के साथ लोगो की बॉन्डिंग पड़ोसियों और रिश्तेदारों से भी ज्यादा होती है.आपस में ब्लड डोनेशन कार्ड तक शेयर हो जाते है. पैसे खाने या बेठने सोने की जगह या न जाने कितनी मदत.

फिर भी दीवाली के त्यौहार में हम लोग थोड़ा सा अकेला महसस कर रहे थे. न वो घर की सजावट न पटाखों की आवाज़ . बहुत सारे लोग रिलीज़ हो गए थे वार्ड से तो थोड़ा ख़ालीपन भी था.

हॉस्पटल काफी सुना था रात को. .पापा ने बोला की वो छत पे जाके बाहर देखना चाहते है शायद काफी दिनों से बेड पे बोर हो चुके है पर डॉक्टर ने मना कर दिया. सिर्फ बोलै की वार्ड मैं मना लो

मम्मी ने बोला की बहार जाके कैंटीन से कुछ खाने को ले आना. वैसे तो त्यौहार में खाने का इतना ध्यान नहीं रहता पता नहीं उस दिन पकवान की थाली याद आ रही थी. फिर लगा की जब पापा स्वस्थ्य हो जायेंगे तो घर जाके अचे से दिअवली मनाएंगे

अभी बहार आया ही था की देखा कैंटीन बंद हो रही थी शायद दीवाली की वजह से. मैंने मन ही मन सोचा की क्या यार भगवान अब यही बचा था होने को.

मैंने सोचने लगा की चलो बाहर किसी ढाबे से कुछ ले के आता हूँ की वह किसी ने मुझे आवाज़ दी. मैंने देखा कि कोई व्यक्ति मेरी तरफ चला आ रहा था.

उन्होंने मुझे देखते ही पहचान लिया बोले कि अरे भाई आप लोगो को ही खोज रहे थे काफी देर से. उनको सायद वार्ड पता नहीं था इसलिए बाहर ही खड़े थे वो. संदीप भइया रायबरेली मैंने फूफा के घर के पास रहते थे और उनके ही दोस्त थे

वो अपने साथ दिवाली का खाना ले के आये थे. बहुत सारे पकवान और वो भी रायबरेली से लखनऊ दिवाली के दिन अपना त्यौहार छोड के. .संदीप भइया के आने से दिवाली एक त्योहार सा बन गया उस हॉस्पिटल में.

पापा भी काफी खुश थे और डॉक्टर ने वो खाना उनके खाने के लिए बोल दिया हम सब ने खाना खाया साथ मैं और संदीप भइया भी हमारे साथ ही रहे संदीप भइया बस इधर उधर की बातें करते रहे लगा ही नहीं की हम लोग हॉस्पिटल में है

संदीप भैया चले गए और सच बोलूँ तो उनसे कभी मुलाकात हुई भी नहीं.मुझे उस दिन लगा कि शायद भगवान ही थे जिन्हें हमारी याद आ गयी और वो संदीप भइया बन के आ गए. सच मैं दुनिया में कुछ लोग आपको निस्वार्थ वो खुशिया देके चले जाते है जिसको जीवन भर भूल पाना मुश्किल है