Yadav Chole
बात 90 के दसक की थी जमुना कॉलेज के बहार यादव जी का छोले का एक बड़ा सा ठेला लगा होता था. उन दिनों स्कूल के लंच टाइम की वही दुकान थी हमारी. पचीस और पचास पैसे में मुख्य प्लेटें होती हैं और छोले चावल का स्वाद बहुत ही मजेदार सा था.लंच टाइम पे भीड़ होती थी पर टिफिन ले जाने के बवजूद मुझे यादव जी छोले बहुत पसंद थे. यादव जी एक्स्ट्रा छोले या चटनी देने में अक्सर ही आनाकानी कर देते थे.
एक दिन देखा की यादव जी कॉलेज के बच्चे को छोला चावल बिना कुछ बोले आराम से दिए जा रहे हैं. ना तो पैसे ही मांगे उससे लड़के से और वो भी स्कूल की यूनिफॉर्म में था. मैंने जिज्ञासावास पूछा की यादव जी इस लड़के को तो कुछ नहीं बोला आपने एक्स्ट्रा देने पे ना ही पैसे लिए.
यादव जी शांत रहे फिर बताने लगे उसी लड़के की कहानी. लड़का कुछ दिनों पहले उनके यहां काम मांगे आया था. किसी बस्ती में रहता था और गांव से आया था इलाहाबाद. वो पढ़ना चाहता था पर ज्यादा पैसे नहीं थे घर में. यादव जी ने काम पे रखने के बजाए उसे पढ़ने के लिए बोला. यादव जी ने सुना था कॉलेज के एक टीचर के बारे में मैं जो गरीब बच्चों के एडमिशन और फीस में मदद करते हैं वो भी किसी बच्चे से . उनोह्ने त्रिपाठी सर से बात की और उस बच्चे का एडमिशन करावाया और त्रिपाठी सर ने फीस भरने का आश्वासन दिया. बच्चे के लिए अभी भी खाना एक प्रॉब्लम थी क्योंकी उन दिनों स्कूल में कोई मिड डे मील योजना नहीं थी।
यादव जी ने गरीब बच्चे के लिए अपनी दुकान मिड डे मील से बना राखी थी. बच्चे से कोई पैसे नहीं लेते वो। मेरे लिए उनके लिए बहुत श्रद्धा सी बढ़ गई। यादव जी बहुत छोटी सी दुकान चलाने वाले इतना सोचा पाया गरीब लड़के के लिए.
2010 मैं एक बार जब इलाहाबाद गया तो ना जाने क्यों सोचा कॉलेज के पास जाके यादव जी का छोला खाया जाए। कॉलेज के पास काफी कुछ चेंज हो गया था और वो दुकान भी नहीं देखी.
एक पन्ने वाले से पूछने की यादव जी की छोले का ठेला था काफी पहले यहां पे. उसे बताया कि अब वो कटघर के पास एक दुकान चलते हैं.
यादव जी की दुकान मिल गई कटघर मैं तोड़ी दूर पे गौतम सिनेमा हाल के पास. उनको पहचानना मुश्किल था दुकान के नाम से लगा यही होंगे. मैंने बताया उनको पहले उनका ठेला होता था कॉलेज के सामने. वो बोले हां बेटा काफी पुरानी बात है फिर मैंने उनसे उसी लड़के के बारे में पूछा . यादव जी ने बताया कि उसी लड़के ने काफी पढाई की और सरकारी नौकरी पर लग गया था. उसीने उनकी इस दुकान बनवाने में मदद करी है।
यादव जी आंखों में आंसू आ गए थे बोलते बोलते…..