आज सुबह दादाजी दादी से धीरे-धीरे कह रहे थे कि इस बार कल्पवास के लिए बच्चों को साथ नहीं ले जाएंगे। मैंने उनकी बातें चुपके से सुन लीं, और मुझे समझ आ गया कि इस बार मेरा ही नाम कटने वाला है।

उन दिनों कल्पवास का मतलब था एक महीने की बेहतरीन छुट्टियाँ। कुंभ मेले में कुटिया में जाकर एक महीने तक रहना। बचपन की सबसे खास छुट्टियाँ। यह बात काफी पुरानी है। हमारे दादाजी-दादी अयोध्या के गुरुकुल कांगड़ी नामक एक आश्रम से जुड़े हुए थे। उस आश्रम के अखाड़े की कई कुटिया महाकुंभ में लगती थीं, और दादा-दादी को वहां एक महीने रुकने का सौभाग्य मिलता था।

घर में कल्पवास की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं, और मेरा उत्साह बढ़ता ही जा रहा था। कुंभ मेले की कहानियाँ और वहाँ के माहौल को सुनकर मैंने ठान लिया था कि इस बार मुझे वहाँ जाना ही है। सपनों में भी कुटिया दिखाई देने लगी थी। दादी और दादाजी अपनी योजना बना रहे थे, और मुझे पता चला कि मेरे एक कज़िन टिंकू और उसके दादा-दादी भी साथ जाने वाले हैं।

संगम में नाव की सवारी करना और उसके पवित्र पानी में डुबकी लगाना। मेले में सजे बड़े-बड़े पंडाल और रंग-बिरंगे झूले मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे।

मैंने दादी-दादाजी को खुश करने के लिए उनके सारे काम करने शुरू कर दिए, लेकिन ऐसा लग रहा था कि वो मुझे नजरअंदाज कर रहे हैं या फिर जानबूझकर ध्यान नहीं दे रहे। आखिर एक दिन मैंने दादी से सीधे कह दिया, “मैं भी आपके साथ कल्पवास जाऊंगा।”

दादी ने बहुत समझाने की कोशिश की कि स्कूल छूट जाएगा और नुकसान होगा, लेकिन मैंने जिद पकड़ ली। काफी मान-मनौव्वल के बाद वे एक हफ्ते के लिए मुझे ले जाने को तैयार हो गए।

कुंभ मेले में पहुँचते ही लगा कि यह कोई अपना शहर नहीं, बल्कि एक विशाल नगरी है, जहाँ हर तरफ मेला लगा हुआ है। झूलों वाली दुकानें, सर्कस, जादूगरों के पंडाल, और बड़े-बड़े प्रदर्शनी पंडाल—यह सब देखकर मन रोमांच से भर गया। इतनी सारी चीजें थीं कि एक महीने में भी सब देख पाना मुश्किल था।

हमारी कुटिया भी बहुत सुंदर थी। वहाँ कई नए दोस्त बन गए थे। रोज खेलना और घूमना, ऐसा लगता था जैसे यह सबसे अच्छी जगह है। मेरी कल्पना से भी ज्यादा सुंदर और अद्भुत।

एक दिन, मेरे दोनों भैया दादाजी के साथ घर से सामान लेने गए। लौटते समय दादाजी, जो साइकिल पर थे, और भैया, जो रिक्शे पर सामान लेकर थे, कुंभ के बीच में बिछड़ गए। भैया को रिक्शेवाले ने बताई गई जगह पर उतार दिया और वे सामान लेकर कुटिया आ गए। लेकिन दादाजी को लगा कि बच्चे कहीं खो गए हैं।

घबराए हुए दादाजी ने जाकर मेले में घोषणा करवा दी। थोड़ी देर बाद, जब वे कुटिया लौटे, तो देखा कि बच्चे सही-सलामत कुटिया   पर हैं। हम सबने राहत की सांस ली। कुछ देर बाद रिक्शेवाला भी आ गया और बोला, “मैंने घोषणा सुनी, तो सोचा आकर देख लूँ। मैंने तो पास ही में उतारा था।”

कल्पवास वाकई एक ऐसी जगह थी, जहाँ आपके सपने सच हो जाते। वह समय मेरे बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है।