गर्व
“कैसा लग रहा है, बेटा, इतने सालों बाद अपने देश वापस आकर?” शुक्ला अंकल ने घर में प्रवेश करते ही पूछा। शुक्ला अंकल पापा के पुराने दोस्त और करीबी सहयोगी थे। उन्होंने हमें बचपन से बड़ा होते देखा था। मैंने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “अच्छा लग रहा है, अंकल। लेकिन अब सब कुछ पहले से काफी बदल गया है।”
अंकल ने सिर हिलाकर सहमति जताई। उनका बेटा अमित भी गुरुग्राम में मैनेजर था। थोड़ी देर तक वे उसी की बातें करते रहे।
“आजकल भारत बहुत तरक्की कर रहा है। अमित बताता है कि अब तो लोग विदेश से लौटकर वापस भारत में बसने लगे हैं,” उन्होंने कहा। मैंने सहमति में सिर हिलाया। उनकी बातों में सच्चाई थी।
उन्होंने आगे कहा, “सुनने में आया है कि वहां विदेश में न तो नौकर मिलते हैं और न ही मेडिकल अपॉइंटमेंट्स आसानी से मिल पाती हैं।”
फिर वे बोले, “यहां भी अब अच्छी-खासी सैलरी मिलने लगी है। लेकिन फिर भी, तुम लोगों को विदेश में ऐसा क्या सुख मिलता है?” उनके इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
मैंने बात का रुख बदलने की कोशिश करते हुए पूछा, “अमित का गुरुग्राम वाला घर कैसा लगा आपको, अंकल?”
अंकल ने बिना रुके जवाब दिया, “मुझे तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। वहां लोग अपार्टमेंट्स में बंद रहते हैं। मैं ऐसी जगह कभी नहीं रह सकता। इसीलिए अमित ही अक्सर इलाहाबाद आ जाता है। पहले हर महीने आ जाता था, लेकिन अब दोनों (अमित और उसकी पत्नी) काम में इतने व्यस्त रहते हैं कि मुश्किल हो गया है। अब तो छह महीने में एक बार ही आ पाता है।”
थोड़ा रुककर अंकल ने फिर कहा, “लेकिन खुशी इस बात की है कि वह हमारे पास ही है। जब भी जरूरत होती है, आ सकता है।” उनकी बातों से साफ था कि वे यह जताने की कोशिश कर रहे थे कि विदेश में रहना सही नहीं है।
मैंने अपनी बात रखते हुए कहा, “अंकल, सच कहूं तो यह तय करना मुश्किल है कि शहर से बाहर जाना सही है या देश से बाहर। बस यही सच है कि नौकरी और करियर जहां सही लगा, हम वहीं चले गए।”
अचानक, अंकल ने एक भावुक बात कह दी, “तुम्हारे पापा जबरदस्ती गर्व जताते थे तुम लोगों के विदेश जाने पर। लेकिन शायद अपने आखिरी समय में उन्हें इसका अहसास हुआ होगा।”
उनकी बात सुनकर मैं बिल्कुल चुप हो गया। अब न पापा थे, न मम्मी, कि मैं उनसे पूछ पाता कि क्या उन्हें सच में गर्व था या वे भीतर ही भीतर दुखी थे।
शायद अंकल यह सब कहकर खुद को थोड़ा हल्का महसूस कर रहे थे। अक्सर, हम दूसरों से ऐसी बातें कह देते हैं, जो उन्हें अंदर तक छू जाएं, और इससे हमें राहत मिलती है। वह गर्व, जिसने कभी हमें चोट पहुंचाई हो, शायद उनका अपना नहीं था, बस कहने की बात भर थी।
अंकल यह सब कहकर अंदर चले गए। थोड़ी देर बाद, आंटी चाय लेकर आईं। उन्होंने बताया कि पिछले साल ही अमित की शादी हुई थी। “उसने और उसकी पत्नी दोनों ने अपनी मर्जी से शादी की।”
आंटी धीरे-धीरे अपनी बात कहने लगीं, “बेटा, तुम्हारे पापा ने सच में अच्छे संस्कार दिए थे। तुम लोग विदेश में रहते हुए भी उनकी मर्जी से शादी की। और यहां हमारे बच्चे, जिन्हें हमेशा संस्कारी समझा, अपनी मर्जी से शादी कर बैठे। ऊपर से हमें धमकी भी दे डाली। अब हम कर भी क्या सकते थे?”
आंटी ने मुस्कुराते हुए कहा, “सच में, तुम्हारे पापा को तुम पर बहुत गर्व होता।” उनकी बात सुनकर मेरी मुस्कान लौट आई।
उनकी बातों ने मुझे गहरे विचारों में डुबो दिया। वाकई, गर्व और दुख दोनों ऐसी भावनाएं हैं, जिन पर हमारा कोई बस नहीं चलता। गर्व भी एक अनोखी अनुभूति है—कभी यह गुस्से को मुस्कान में बदल देता है, तो कभी दिल को बोझिल कर जाता है।