माँ बार-बार बच्चे का माथा छूकर देखतीं और हर बार उनकी चिंता बढ़ जाती। बुखार था कि उतरने का नाम नहीं ले रहा था, और अब यह दूसरे दिन में पहुंच चुका था। आखिरकार, थक-हारकर माँ ने फैसला किया कि डॉक्टर के पास जाना ही पड़ेगा। पापा कानपुर गए हुए थे और रविवार को लौटने वाले थे। माँ ने घर की अलमारियों और कागजों के नीचे से पैसे खंगालना शुरू किया। बहुत खोजने के बाद, उन्हें मात्र 20 रुपये ही मिले।

परेशानी उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। माथे का पसीना पोंछते हुए वह सोचने लगीं कि 20 रुपये तो सिर्फ डॉक्टर की फीस में ही चले जाएंगे, फिर दवा के पैसे कहां से आएंगे। कई घंटे की तलाश और चिंता के बाद, उन्होंने बच्चे का माथा फिर से छूकर देखा। इस बार वह खुद को रोक नहीं सकीं।

बच्चे को गोद में उठाया और पैदल ही डॉक्टर की क्लिनिक की ओर चल पड़ीं। लंबा रास्ता तय करने के बाद माँ थकने लगीं। यह देखकर बच्चे ने हिम्मत दिखाई और कहा, “मैं पैदल चल लूंगा।” कुछ दूर वह खुद चला, लेकिन जल्दी ही थक गया। किसी तरह दोनों गोल पार्क वाली क्लिनिक पहुंच गए। डॉक्टर की क्लिनिक में भीड़ नहीं थी। माँ के चेहरे पर थकान और चिंता साफ नजर आ रही थी।

डॉक्टर ने चेकअप के बाद बताया कि वायरल बुखार है और एंटीबायोटिक दवाएं लेनी पड़ेंगी। डॉक्टर उनके परिवार के परिचित थे और माँ की परेशानी भांप गए। उन्होंने अपनी दराज से कुछ दवाएं निकालकर एक थैले में रख दीं और सिर्फ 20 रुपये फीस लिखी, जो बहुत कम थी। फीस चुकाकर माँ बेटे को लेकर बाहर आ गईं। लेकिन अब माँ को लगा कि बच्चा पैदल नहीं चल पाएगा और उसका बुखार भी बढ़ने लगा था।

धीरे-धीरे ठंड भी बढ़ रही थी। माँ ने एक रिक्शा आते देखा और पूछ लिया, “कल्याणी देवी चलोगे?” रिक्शावाले ने बैठने का इशारा किया। माँ बेहद परेशान थीं, क्योंकि डॉक्टर की फीस चुकाने के बाद उनके पास पैसे नहीं बचे थे। उन्होंने धीरे-धीरे रिक्शावाले से कहा, “भाई, बच्चे की हालत खराब है, इसलिए रिक्शा लेना पड़ा। नहीं तो पैदल ही जाती। पर मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

रिक्शावाले ने उनकी बात सुनी और कहा, “कोई बात नहीं, माता जी। सिर्फ 5 रुपये दे देना।” माँ ने बेबस होकर कहा, “मेरे पास 5 रुपये भी नहीं हैं, लेकिन आप घर आकर खाना खा सकते हैं।”

कुछ पल सोचने के बाद रिक्शावाले ने कहा, “माता जी, मैं तो ढाबे पर खाना खाता हूँ और वहाँ महीने के पैसे देता हूँ। पर आपकी परेशानी समझता हूँ। आप पैसे बाद में दे दीजिए।”

माँ की आँखों से आंसू गिर पड़े, जो बच्चे के गाल पर टपक गए। घर पहुँचने पर रिक्शावाले ने माँ को ढांढस बंधाया और कहा, “परेशान मत होइए, माता जी। बच्चा जल्दी ही ठीक हो जाएगा।”

यह कहते हुए वह बिना पैसे लिए चला गया, और फिर कभी पैसे लेने नहीं आया।