विदा
मैं अपना बैग बंद करने में व्यस्त था, तभी पीछे से आवाज सुनाई दी। पलटकर देखा तो पापा कमरे में आ रहे थे। उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने पूछा, “सारा सामान पैक हो गया तुम्हारा?” मैंने हल्के से सिर हिलाकर हामी भरी। घर से विदा लेते समय दिल हमेशा भारी हो जाता है। हम जैसे सिर्फ वीकेंड पर घर आने वाले मेहमान बनकर रह गए हैं।
शनिवार की सुबह जब घर पहुंचते हैं, तो हर चेहरे पर खुशी होती है। लेकिन जाने का समय ऐसे आता है, जैसे वक्त ने अचानक रफ्तार पकड़ ली हो। हर बार यह सवाल मन में उठता है कि जब जाना तय है, तो माहौल इतना भावुक क्यों हो जाता है?
पापा से बात करते समय अक्सर शब्द कम पड़ जाते थे। न हम कुछ कह पाते, न वो। उन्होंने धीरे से कहा, “अगले हफ्ते हम तुम्हें एयरपोर्ट छोड़ने चलेंगे।” मैंने तुरंत जवाब दिया, “अरे, आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। वैसे भी अंदर जाने नहीं देते।”
अगले हफ्ते मेरी शिकागो की फ्लाइट थी। पापा और मम्मी को एयरपोर्ट छोड़ने जाना कभी पसंद नहीं था, लेकिन स्टेशन की बात अलग थी।
पापा हमेशा मुझे इलाहाबाद स्टेशन छोड़ने आते थे, चाहे मैं कितना भी मना करूं। ट्रेन 9:30 की होती थी, पर पापा वक्त से पहले पहुंचा देते और ट्रेन के भीतर सीट तक छोड़ते। लाख कहने पर भी कि “अब आप जाइए,” वो ट्रेन के चलने तक वहीं खड़े रहते। जब ट्रेन चलती और पापा भीड़ में खो जाते, तो दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं।
बचपन में जब पापा स्टेशन पर कुछ लेने बाहर जाते और ट्रेन चलने लगती, तो हम घबरा जाते। जब वो मुस्कुराते हुए डिब्बे में लौटते, तो राहत मिलती। शायद यही वजह है कि आज भी ट्रेन चलने पर आंखें उन्हें ढूंढ़ती हैं, मानो वो किसी गेट से मुस्कुराते हुए आएंगे। पर इस बार सफर अकेले ही करना था।
मुझे आज भी याद है जब मनीष भैया पहली बार नौकरी के लिए जमशेदपुर जा रहे थे। हम सभी उन्हें स्टेशन छोड़ने गए थे। उनकी ट्रेन देर से थी और पूरा स्टेशन रिश्तेदारों से भरा हुआ था। जब ट्रेन चली, तो हमारी आँखें नम हो गईं।
कुछ सालों बाद, जब मनीष भैया विदेश गए, तो पापा एयरपोर्ट के बाहर खड़े होकर तब तक उन्हें जाते हुए देखते रहे, जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गए। पहली बार जब वे लौटते हुए किसी विमान को टेक-ऑफ करते देख रहे थे, तो उन्होंने कहा, “गाड़ी रोक दो, इस विमान में भैया हैं, मैं उन्हें आसमान में जाते हुए देखना चाहता हूँ।” जब वह विमान आसमान में गायब हो गया, तो उनकी आँखों में नमी थी।
पापा हमेशा अपनी खुशी ही जाहिर करते थे, लेकिन मैंने एक बार उन्हें “चिट्ठी आई है” गाने पर भैया के लिए रोते हुए भी देखा था।
पापा-मम्मी मुझे छोड़ने एयरपोर्ट तक आए थे, और मुझे पता था कि वे बाहर खड़े होकर मुझे वैसे ही दूर से देख रहे होंगे। लेकिन मैंने पूरी कोशिश की कि पीछे मुड़कर न देखूं।
मंज़िलों को पाने के लिए कभी-कभी खुद को मजबूत दिखाना भी ज़रूरी होता है।
सालों बाद जब मैं भारत गया, तो उसी भीड़-भाड़ में पापा-मम्मी को ढूंढता रहा। पता था कि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन न जाने क्यों, उस भीड़ में ऐसा महसूस हुआ जैसे वे आए हों, मुझे लेने।
अब जब भी एयरपोर्ट से कहीं जाता हूँ, तो अनायास ही पीछे मुड़कर उन्हें ढूंढने लगता हूँ—शायद वे कहीं से मुझे देख रहे हों, या फिर मेरे विमान को आसमान में उड़ता हुआ देखकर मुस्कुरा रहे हों।
