विदेश
दरवाजे पर ज़ोर से दस्तक हुई। मैं थोड़ा चौंका, इस वक्त कौन आ गया? दरवाजा खोला तो सामने एक दुबला-पतला भारतीय लड़का खड़ा था। उम्र कोई 20-25 साल रही होगी। हल्की ठंड में भी माथे पर पसीना था, हाथ में iPad पकड़े हुए जैसे ही उसने अपनी रटी-रटाई सेल्स पिच शुरू करने की कोशिश की, मैंने मुस्कुराते हुए बीच में ही पूछ लिया, “भारत में कहां से हो?”
मेरी हिंदी सुनकर वह ठिठक गया। आंखों में हल्की सी चमक उभरी, जैसे किसी भूले-बिसरे अपने को पहचान लिया हो। थोड़ा संभलते हुए बोला, “आगरा से।” मैंने उसे अंदर आने का इशारा किया। झिझकते हुए वह अंदर आया, शायद उम्मीद नहीं थी कि कोई उसे इतनी आत्मीयता से बुलाएगा।
वह बिजली और गैस के सब्सक्रिप्शन बेच रहा था। आयरलैंड में यह सेवाएं निजी कंपनियां देती हैं, हर किसी के अपने रेट होते हैं। मेरा तो कोई इरादा नहीं था अपना कॉन्ट्रैक्ट बदलवाने का, लेकिन न जाने क्यों, उस लड़के की आंखों में एक अपनापन सा महसूस हुआ। हजारों मील दूर, जहां अपनी भाषा बोलने वाला भी मुश्किल से मिलता है, वहां कोई अपना-सा मिल जाए तो अजनबी भी घर जैसा लगने लगता है।
मैंने हल्की मुस्कान के साथ पूछा, “चाय पियोगे?”
वह थोड़ा संकोच में पड़ गया, लेकिन फिर हल्के से सिर हिला दिया।
कुछ ही देर में नेहा चाय और गर्मागर्म समोसे लेकर आई। लड़के की आंखों में एक अलग सी चमक थी, शायद यह अपनापन उसने बहुत दिनों बाद महसूस किया था। मानो उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई उसे ऐसे बैठाकर चाय पिला रहा है।
मैंने कहा, “जो भी डॉक्युमेंट चाहिए, बता दो, मैं दे देता हूं। बस तुम कॉन्ट्रैक्ट बना देना।”
वह हड़बड़ा गया, “पर सर, आपने रेट्स तो पूछे ही नहीं?”
मैंने हल्का सा हंसते हुए पूछा, “अच्छा, तुम कब से इस कंपनी में हो?”
उसने जवाब दिया, “आठ महीने पहले कॉलेज खत्म किया था। अभी पंद्रह दिन पहले ही यह जॉब जॉइन की है। इससे पहले एक रेस्टोरेंट में काम करता था।”
मैंने सवाल किया, “आयरलैंड क्यों आए थे पढ़ने?”
यह सुनते ही उसका चेहरा थोड़ी देर के लिए बुझ गया। हल्की आवाज़ में बोला, “इंटरनेशनल बिज़नेस में मास्टर्स करने आया था।”
मैं कुछ देर के लिए खामोश हो गया।
फिर मैंने पूछा, “घर में पता है कि तुम घर-घर जाकर सेल्स का काम कर रहे हो?”
उसने नजरें झुका लीं, “नहीं सर, अभी तो बस काम ढूंढ ही रहा हूं, इसलिए घर पर कुछ बताया नहीं। क्या करूं सर, मार्केट बहुत खराब है। कोई भी ‘Stamp 1G’ का नाम सुनकर नौकरी देने से मना कर देता है।”
मैंने गहरी सांस ली और थोड़ा गंभीर होकर पूछा, “लेकिन जब यहां आने का फैसला लिया, तब क्या तुम्हें जॉब मार्केट और वीज़ा की दिक्कतों के बारे में नहीं बताया गया था?”
वह हल्का सा मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द छिपा था। “इंडिया में एजेंट ने कहा था कि आयरलैंड में जॉब मार्केट बहुत अच्छा है। यहां बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं, और हर किसी को नौकरी मिल जाती है। कई लोगों से बात भी करवाई थी, लेकिन जब यहां आया, तो असलियत कुछ और ही निकली। जितने भी बच्चे मेरे साथ आए थे, किसी को भी अच्छी नौकरी नहीं मिली। सब मेरी तरह ही किसी न किसी छोटे-मोटे काम में लगे हुए हैं और साथ ही नौकरी भी तलाश रहे हैं।”
मैंने धीरे से पूछा, “भारत में ही रहकर पढ़ाई करने के बारे में नहीं सोचा?”
उसकी आंखों में कहीं एक दबी हुई उदासी दिखी। “सर, वहां एडमिशन लेना आसान नहीं था। नोएडा की एक यूनिवर्सिटी में मिला था, लेकिन वहां बस अमीर घरों के बच्चे पढ़ते थे। हर दिन कोई न कोई फेस्ट, कोई पार्टी… ऐसा लगता था कि पढ़ाई से ज्यादा वहां सिर्फ दिखावा चलता है। लगा कि विदेश जाकर मास्टर्स कर लूंगा तो सब सही हो जाएगा, अच्छी नौकरी मिल जाएगी, और लाइफ सेट हो जाएगी।”
मैंने गहरी सांस ली। उसकी बातें सुनकर समझ नहीं आया कि क्या कहूं? क्या उसने सही किया या गलत?
“देखो भाई, मैं यह नहीं कह सकता कि तुमने सही किया या गलत, लेकिन यहां अच्छी नौकरी ढूंढना आसान नहीं है। तुम्हें वीज़ा स्पॉन्सरशिप चाहिए होगी, और अगर वो नहीं मिली, तो दो साल बाद वापस जाना पड़ सकता है। और यह स्पॉन्सरशिप इतनी आसानी से नहीं मिलती।”
मैंने उसे समझाया, “आयरलैंड का जॉब मार्केट अच्छा है, लेकिन खासतौर पर IT वालों के लिए। MBA करने के बाद नौकरियों के मौके बहुत सीमित हो जाते हैं।”
फिर मैंने उससे कहा, “अपना CV मुझे भेज देना, मैं तुम्हें अपनी कंपनी में रेफर कर दूंगा। लेकिन दोस्त, यह राह आसान नहीं है।”
उसकी आंखों में हल्की उम्मीद जगी। उसने अपना CV निकाला और हाथ जोड़कर धन्यवाद कहा।
कुछ दिन बाद, उसका ईमेल आया। मैंने उसे सलाह दी कि शायद किसी प्रोफेशनल से CV बनवाना चाहिए। कुछ दिनों बाद, उसने मुझे बताया कि उसने एक IT कोर्स में दाखिला ले लिया है।
उस दिन उससे मिलने के बाद, मैं देर तक सोचता रहा।
उस लड़के की आंखों में कहीं अपना ही अक्स दिखा। सालों पहले मैं भी विदेश पढ़ने जाना चाहता था, लेकिन किसी वजह से नहीं जा पाया। शायद मैं खुशकिस्मत था कि भाइयों का सही मार्गदर्शन मिला और नौकरी की तलाश में ही यहां आ गया।
पर न जाने कितने ही बच्चे बिना पूरी जानकारी लिए, बस सपनों की गठरी बांधकर विदेश चले आते हैं। उनमें से कितने ही बिना नौकरी पाए, लाखों का एजुकेशन लोन लिए वापस लौट जाते हैं… अधूरे सपनों और टूटे हुए हौसलों के साथ।