भीड़
यह सुनते ही उसकी आँखें भर आईं, आवाज़ में एक गहरी बेबसी थी
“भैया, ट्रेन में सीट दिलाने का कितना लोगे?” उसने स्टेशन पर खड़े कुली से धीमे स्वर में पूछा। देखने में वह एक मध्यमवर्गीय परिवार का व्यक्ति लग रहा था, पर उसकी बातों में स्पष्ट रूप से याचना झलक रही थी। मानो वह किसी गहरे संकट में हो और यह यात्रा उसके लिए अत्यंत आवश्यक हो।
कुंभ मेले का समय था, और पूरा देश प्रयागराज की ओर उमड़ा पड़ा था। ऐसा लग रहा था कि इस बार संगम में स्नान किए बिना जैसे मोक्ष अधूरा रह जाएगा। हर किसी के मन में एक ही जुनून था—किसी भी तरह प्रयागराज पहुँचना है। ट्रेनों में कोई आरक्षण नहीं, हवाई जहाज के टिकट आसमान छू रहे थे, जो आम आदमी की पहुँच से बाहर थे। बसें और टैक्सियाँ लंबे जाम में फँसी थीं।
मुझे अपने गृहनगर में एक शादी में शामिल होना था, और सौभाग्य से मेरा टिकट पहले से ही बुक था—वह भी एसी कोच में। इसलिए मैं निश्चिंत था कि कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन जब न्यूज़ चैनलों पर यात्रियों की हालत देखी, तो बेचैनी बढ़ने लगी। घबराहट इतनी थी कि मैं ट्रेन छूटने के एक घंटे पहले ही अजमेरी गेट स्टेशन पहुँच गया, जहाँ से प्रयागराज जाने वाली ट्रेन 16 नंबर प्लेटफॉर्म से निकलती थी।
स्टेशन के बाहर मैं कुछ सोच ही रहा था कि तभी उस व्यक्ति की करुण पुकार मेरे कानों में पड़ी। कुली ने उससे पूछा, “कहाँ जाना है, साहब? और किस ट्रेन का टिकट है?”
“भैया, प्रयागराज एक्सप्रेस… और मुझे प्रयागराज ही जाना है,” उस व्यक्ति ने काँपती आवाज़ में कहा।
“टिकट कन्फर्म है?”
“हाँ, लेकिन स्लीपर में सीट तक पहुँचना आसान नहीं होगा।”
कुली हँसते हुए बोला, “अरे साहब! प्रयागराज में अब स्लीपर क्या, एसी कोच में भी सीट तक पहुँचना आसान नहीं होगा। 500 रुपये देने होंगे, तो मैं खिड़की के रास्ते से अंदर करवा दूँगा।”
“500? भैया, यह तो बहुत ज़्यादा है!”
“साहब, कुंभ का पुण्य कमाना है, तो इतना तो देना ही पड़ेगा। आपने देखा नहीं, हवाई जहाज का टिकट कितना महँगा है? अगर अब नहीं कमाएँगे, तो कब कमाएँगे? आपको भी तो पुण्य कमाना है!”
“अरे नहीं भैया, मैं संगम स्नान के लिए नहीं जा रहा। मेरे पिताजी की तबीयत खराब है, इसलिए जाना ज़रूरी है। प्रयागराज का मतलब सिर्फ़ कुंभ ही नहीं होता, वहाँ रहने वालों की भी ज़रूरतें होती हैं।”
“अच्छा चलिए, 300 दे दीजिए।”
उनकी बातचीत सुनकर मेरे अंदर भी घबराहट बढ़ने लगी। मैं सोचने लगा कि प्लेटफॉर्म के अंदर जाऊँ भी या नहीं। वर्षों बाद ऐसी भीड़ देखी थी, और अजीब घुटन महसूस हो रही थी।
तभी पीछे से भीड़ का एक ज़ोरदार धक्का आया, और हम सभी प्लेटफॉर्म के अंदर पहुँच गए। तभी किसी ने चिल्लाकर बताया कि स्पेशल ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर आ रही है। अब वहाँ न कुछ सुनाई दे रहा था, न कुछ साफ़ दिखाई पड़ रहा था—बस भीड़ का एक बेकाबू सैलाब। बच्चों की चीखें, “हर हर गंगे” के जयकारे, और सांस लेने तक की जगह नहीं थी। मुझे यह भी समझ नहीं आ रहा था कि यह भीड़ मुझे कहाँ ले जा रही है।
इसी अफरातफरी में किसी ने कहा, “खिड़की-दरवाजे के पास मत बैठना, लोग अंदर घुसने के लिए पत्थर मार रहे हैं। कल ही किसी का सिर फट गया था।”
तभी सामने वाले प्लेटफॉर्म पर एक ट्रेन आई, और भीड़ से आवाज़ आई—“ये ट्रेन प्रयागराज जाएगी!” अब सारी भीड़ उस ओर दौड़ पड़ी। मैं पहले ही तय कर चुका था कि यह यात्रा मुझे नहीं करनी है, लेकिन अब स्टेशन से बाहर निकलने का कोई रास्ता भी नहीं दिख रहा था।
फिर अचानक पुल की ओर बढ़ती भीड़ ने एक ज़ोरदार धक्का दिया, और न जाने कितने लोग नीचे गिरकर भीड़ में दब गए…
मैं पसीने से लथपथ भाग रहा था… उस भीड़ से दूर…
अचानक मेरी आँखें खुलीं। मैं अभी भी आयरलैंड में, अपने घर में था
मैं पसीने से लथपथ हाँफ रहा था। कमरा अंधेरे में डूबा था।
मैंने घड़ी की ओर देखा—रात के तीन बज रहे थे। दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था, साँसें उखड़ी हुई थीं। पानी की बोतल उठाई, एक घूँट पिया, मगर गले का सूखापन कम नहीं हुआ।
मन में अजीब ख्याल उमड़ने लगे। क्या यह सिर्फ़ मन का भ्रम था, या सच में कहीं कुछ घटित हो रहा था?
मैं सोचने लगा—शायद इस बार प्रयागराज ना जाने की वजह से ही ऐसा सपना आया होगा।
तभी मेरी नज़र सामने टेलीविज़न स्क्रीन पर पड़ी।
न्यूज़ चैनल पर दिल्ली स्टेशन की भगदड़ की ख़बर चल रही थी।
तो क्या…?
मैं शायद न्यूज़ देखते-देखते ही सो गया था, और यही सारी घटनाएँ मुझे अपने साथ घटती हुई महसूस हुईं।
सपना था… पर क्या सच में सिर्फ़ सपना ही था?
