भाषा — एक अनकहा रिश्ता
भाषा — एक अनकहा रिश्ता
अभी-अभी सीट बेल्ट बाँधी ही थी कि बगल वाली सीट पर बैठीं एक वृद्धा ने काँपते हाथों से मेरी ओर एक काग़ज़ बढ़ाया। चेहरा झुर्रियों से भरा, लेकिन आँखों में एक सुकून और विश्वास था — जैसा अपनी माँ की आँखों में होता है।
मैं शिकागो से नई दिल्ली जा रहा था, फ्रैंकफर्ट होकर। वैसे भी, एयर इंडिया की फ्लाइट में बैठते ही ऐसा लगता है जैसे आधा इंडिया साथ चल पड़ा हो — स्टाफ से लेकर मुसाफ़िर तक, सब भारतीय। किसी ने “भैया पानी मिलेगा?” कहा, तो किसी ने “भाइयो ज़रा हटिए…” — और फिर वो परिचित सी हिंदी की गूँज… मन कहीं घर पहुँचने से पहले ही पहुँच गया।
वो आंटी काफ़ी बुज़ुर्ग थीं। शायद अकेली थीं, और किसी सहारे की तलाश में। मैंने जैसे ही वो काग़ज़ पढ़ा, उसमें लिखा था —
“मेरी माँ को मराठी के अलावा कोई भाषा नहीं आती। कृपया इनकी मदद करें और इन्हें फ्रैंकफर्ट से मुंबई जाने वाली फ्लाइट तक पहुँचा दें।”
मैंने मुस्कराकर उनकी ओर देखा और कहा,“आंटी, मैं हूँ न, आप चिंता मत करिए।”
शब्द उन्होंने नहीं समझे, लेकिन आँखों से पढ़ लिया — वो जो भरोसा किसी अनजान में भी बस यूँ ही रख लिया जाता है।
मैंने अपनी टूटी-फूटी मिमिक्री में इशारों से उन्हें बताया कि सब ठीक रहेगा। वो मुस्कराईं — एक माँ जैसी मुस्कान — जिसमें धन्यवाद भी था, और दुआ भी।
दो घंटे की कनेक्टिंग फ्लाइट थी, सो मन हल्का था। पर नियति को तो ट्विस्ट देना होता है न?
हमारा प्लेन एक घंटा लेट हो गया। अब बस एक घंटे में इमिग्रेशन, सिक्योरिटी, और नया टर्मिनल ढूँढना था। दिल की धड़कनें तेज़ थीं। मैं बेचैन था, पर आंटी निश्चिंत — शायद उन्हें वक्त की घबराहट का अंदाज़ा नहीं था, लेकिन मेरे चेहरे की बेचैनी उन्होंने भाँप ली।
उन्होंने धीरे से कुछ मराठी में कहा — मैं शब्द तो नहीं समझ पाया, पर भाव साफ़ था —“तू रास्ता ढूँढ लेगा, ना?”
फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर उतरते ही ऐसा लगा जैसे किसी एलियन लैंड पर आ गया हूँ। बोर्ड्स जर्मन में, चारों तरफ़ हड़बड़ी, और हमारे पास समय की सबसे बड़ी कमी।
मैंने आंटी से कहा —“आंटी, बस मेरे साथ रहिए।”
कुछ एयर इंडिया के पैसेंजर्स को फॉलो कर रहा था, पर अचानक लगने लगा — शायद ये रास्ता गलत है। कुछ लोग दाएँ मुड़ गए, कुछ बाएँ, और मेरे पैर जैसे रुक गए। पास ही एक एयरपोर्ट स्टाफ से पूछा, उसने बस सर हिलाकर कहा,“No English.”
अब तो साँसें तेज़ हो गईं। आंटी मेरी ओर देखने लगीं — बिना कुछ बोले जैसे पूछ रही हों, “अब क्या?”
मैंने मुस्कराकर कहा,“डोंट वरी आंटी, मिल जाएगा कोई, भरोसा रखिए।”
और फिर… जैसे किस्मत ने हमारे लिए एक रास्ता लिखा हो — थोड़ी दूर पर एक भारतीय चेहरा दिखा।
मैं लपककर बोला,“भैया, मुझे दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी है, और ये आंटी जी मुंबई की!”
वो मुस्कराया, बोला,“अरे मैं भी दिल्ली जा रहा हूँ, भाई यहाँ कोई इंग्लिश बोलने वाला मिल नहीं रहा!”
हम तीन — एक मराठी आंटी, एक कन्नड़ भाई, और मैं — तीन भाषाएँ, तीन दिशाएँ, पर एक साथ।
थोड़ी मशक्कत के बाद एक अंग्रेज़ी बोलने वाली महिला मिलीं, जिन्होंने रास्ता समझाया। आंटी को जब उनके गेट पर छोड़ा तो उनकी आँखें भर आईं। मैंने उन्हें पानी की बोतल दी और कहा,
“आंटी, ये मेरा नंबर है। इंडिया पहुँच कर फोन करिएगा… कुछ भी हो, बस बताइएगा।”
उन्होंने मेरे हाथों को पकड़ कर सिर हिलाया। कुछ शब्द बोले — मराठी में — जो मैं आज भी नहीं समझता, पर वो एहसास हमेशा याद रहेगा।
बंगलोर वाले भैया और मैं अपने-अपने टर्मिनल की ओर बढ़े। प्लेन की सीट पर बैठा तो ऐसा लगा जैसे किसी जंग से लौटा हूँ। चैन की साँस ली।
टीवी ऑन किया — और सामने न्यूज़ चैनल पर ब्रेकिंग चल रही थी:
“महाराष्ट्र में मराठी न बोल पाने पर कुछ लोगों की पिटाई… और बंगलौर में हिंदी बोर्डों को काले रंग से पोत दिया गया।”
पलभर को आँखें बंद हो गईं।