मैं बहुत गहरी नींद में डूबा हुआ था। मोबाइल की घंटी लगातार बज रही थी, लेकिन नींद इतनी भारी थी कि होश ही नहीं था। जैसे-तैसे आंखें खोलीं, पर अंधेरे होटल के कमरे में कुछ भी साफ नहीं दिख रहा था। सब कुछ अधूरी नींद और थकान में धुंधला-सा लग रहा था।

घंटी की आवाज़ बैग के अंदर से आ रही थी। जैसे ही फोन फिर बजा, स्क्रीन पर देखा—“माँ” का नाम चमक रहा था।

रात के इस पहर माँ का फोन? इंडिया में तो अब आधी रात से भी ज़्यादा हो चुकी होगी…

मैं घबराया—“हेलो मम्मी? इतनी रात को फोन क्यों किया? सब ठीक है ना?”

माँ की वही जानी-पहचानी, थोड़ी डरी, थोड़ी बेचैन, मगर बेहद प्यारी आवाज़ आई—

“खाना खा लिया था तूने? होटल कब पहुँचा? फोन क्यों नहीं किया?”

मैंने नींद भरी आवाज़ में हँसते हुए कहा, “हाँ मम्मी, खा लिया था। आप क्यों परेशान हो रही हो? सो जाइए।”

पर माँ की आवाज़ में अब भी वही चिंता थी…

“तूने फोन क्यों नहीं किया? घर पे सब परेशान हो गए थे।”

मैंने कहा, “फोन डिस्चार्ज हो गया था मम्मी, इसलिए नहीं कर पाया। सुबह सबसे पहले आपको ही फोन करने वाला था। आप परेशान मत हो।”

और तभी यादों की परतें खुलने लगीं…

**माँ, तुम्हारी ये चिंता तो बचपन से साथ रही है। जब स्कूल से देर हो जाती थी, तुम गेट पर खड़ी मेरा इंतज़ार करती रहती थीं।

कोचिंग से न लौटूं तो मेरे सारे दोस्तों को फोन करके पूछती थीं—“अखिल आया क्या?”

जब लखनऊ कॉलेज गया था और फोन करना भूल गया था, तुम सुबह-सुबह हॉस्टल के फोन पर कॉल करती थीं।**

बीमार हो जाऊं तो कहती थीं—

“वो वाली दवा खा ली? भूखे पेट मत लेना, और डॉक्टर को दिखाया की नहीं?”

अब जब इतने हज़ार मील दूर हूं, तब भी…

तुम्हारी चिंता, तुम्हारा इंतज़ार, तुम्हारी ममता… वैसी की वैसी है। जैसे कुछ भी नहीं बदला।

मैंने फिर धीरे से कहा, “मम्मी, खा लिया है, अब आप आराम से सो जाइए…”

माँ ने हमेशा की तरह एक पुरानी कहावत दोहराई—

“माई का जीरा गइले, बेटवा का जी कसाई के।”

ना जाने कब माँ की आवाज़ सुनते-सुनते फिर से नींद आ गई…

सुबह आंख खुली, तो फोन पूरी तरह बंद पड़ा था। बैग खोला, याद आया—चार्जर तो वहीं छूट गया था।

डबलिन से लंदन की फ्लाइट लेट थी, होटल देर से पहुँचा, थकान ऐसी कि बिना खाना खाए ही सो गया था।

रेसेप्शन पर जाकर पूछा—“मोबाइल चार्जर मिलेगा क्या?”

उन्होंने एक कोने की ओर इशारा किया, जहाँ एक चार्जर और केबल लगी थी।

फोन चार्ज किया… स्क्रीन देखी… माँ की कोई कॉल नहीं थी।

तभी समझ आया… वो तो अब इस दुनिया में नहीं हैं।

कोविड के वक़्त माँ हमें छोड़ कर जा चुकी हैं।

पर उस रात… वो सपना था…

या शायद माँ , जो आज भी मेरी थकान, मेरी भूख, और मेरी चिंता में वैसे ही शामिल है…