वो सबसे आलीशान मकान था, शहर के ठीक बीचोंबीच दो बड़े प्लॉट मिलाकर बना, कपूर जी का मकान नंबर 900। एक समय था जब इस मकान में रौनकें ही रौनकें थीं, बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, रसोई से उठती खुशबुएं मोहल्ले भर में फैल जाती थीं। पर आज वो दो हिस्सों में बंट चुका था – 900 G और 900 F।

कपूर जी की चौक में एक बड़ी दुकान थी। उनके दो बेटे थे – बड़ा बेटा पिता का हाथ बटाता था, दुकान की बारीकियों में रम गया था। छोटा बेटा पढ़ाई में अच्छा था, इसलिए कपूर जी ने उसे इंजीनियर बनाने का सपना देखा। वो सपना पूरा न हुआ – नौकरी न मिली तो उसके लिए घंटाघर के पास नई दुकान खुलवा दी गई।

सारा परिवार कभी एक ही घर में था, सब एक ही थाली में खाते, एक ही आंगन में हंसते-खेलते। पर वक्त ने करवट ली – कपूर साहब की लंबी बीमारी ने उनकी मजबूरी को जन्म दिया। उन्होंने सब कुछ बराबर-बराबर बांट दिया, लेकिन दिलों में उठी कड़वाहट को कभी बांट न सके।

बच्चों को लगा कि अब उन्हें खुली हवा मिल गई है, पर वो हवा भी अब ज़हरीली सी लगने लगी थी।
बड़े भाई का धंधा अच्छा चला – पुराने ग्राहकों का भरोसा था। छोटे भाई को दुकानदारी की समझ नहीं थी, और उसका कारोबार मुश्किल में डूबता चला गया। कर्ज़ का बोझ उसे कुचलने लगा।

तंगहाल होकर छोटे भाई ने ऊपर के कमरे किराए पर देने शुरू कर दिए। पढ़ने आए अनजान लड़के उसकी छत पर मंडराने लगे। बड़े भाई की दो बेटियां थीं – उनकी मासूमियत और इज्ज़त की फिक्र बड़े भाई को हर पल सताती रहती थी।
मकान की छत साझा थी, कोई दीवार नहीं – बस एक पतली सी रेखा, जो दीवार होती तो शायद दिलों में इतनी दरार न पड़ती।

बड़े भाई ने कई बार कहा, “चलो, एक दीवार खड़ी कर दें – ताकि परिवार और बेटियों की आबरू महफूज़ रहे।”
पर छोटे भाई ने हमेशा वही कहा – “ये छत तो पिताजी ने मुझे दी थी!”
शब्दों की तल्ख़ियां धीरे-धीरे दिलों में उतरती गईं। रिश्तों के धागे टूटने लगे।

एक दिन बड़े भाई के यहां मेहमान आए थे। उनके बच्चे छत पर खेल रहे थे – तभी किसी ने उन्हें धक्का दे दिया।
नन्हें पांवों की हड्डियां टूट गईं, बच्चों की चीखें और मेहमानों का डर बड़े भाई को अंदर तक तोड़ गया।
उन्होंने छत पर कूदकर लड़कों को पीट दिया – शायद उस दिन उन्होंने अपने भीतर जमा सारा डर और बेबसी बाहर निकाल दी।

छोटे भाई ने मोहल्ले के महाराज जी को बुला लिया – वो वही महाराज थे, जिनसे उसने उधारी ले रखी थी। महाराज जी ने मौका भांप लिया।
छोटे भाई से बोले, “मैं तुम्हारी परेशानी खत्म कर दूंगा – बस मुझे अपना साथ देना होगा।”
महाराज जी ने बड़े भाई को बुलाया और कहा, “तुम्हारे छोटे भाई ने अपना हिस्सा मुझे बेच दिया है – अब मैं यहां पार्टी का दफ्तर बनाऊंगा। अच्छा होगा कि तुम भी अपना हिस्सा मुझे दे दो – कीमत बस इतनी ही है…”
वो कीमत कुछ भी नहीं थी – पर बड़े भाई को समझ आ गया था कि अब लड़ने का मतलब सबकुछ खो देना था।
बेबस होकर उन्होंने वो घर बेच दिया – जैसे दिल का एक टुकड़ा गिरवी रख दिया हो।

महाराज जी ने छोटे भाई से कहा – “अब तुम्हारा करज़ा भी माफ़ – सब खत्म। तुम भी घर बेच दो, और नई ज़िंदगी शुरू करो।”
छोटे भाई की भी आंखों से आंसू झरने लगे। दोनों भाई, जो कभी एक ही चौक में खिलखिलाते थे, आज अपनी जड़ों से बेघर हो गए थे।

कुछ दिन बाद, वो आलीशान मकान अब महाराज निवास था। दोनों भाई शहर छोड़ने की तैयारी करने लगे।
एक शाम, दोनों भाई पहली बार एक साथ बैठे – वो छत अब उनके बीच नहीं थी।
सिर्फ एक टूटा सा सपना और कुछ बेजुबान आंसू।
बड़े भाई ने कांपती आवाज़ में कहा –
“भैया, काश… काश हम साथ रहते। काश दीवारें ईंटों की होती, दिलों की नहीं। तब शायद ये दिन हमें देखने को न मिलता…”
छोटे भाई ने सिर झुका लिया – और उन दोनों की आंखों से बस आंसू बहते रहे।