कॉलेज
कॉलेज
“बस आंखें नीचे रखना… ऊपर मत देखना… कोई कुछ भी बोले तो सुनना ही मत… बस सीधा निकल जाना।”
मेरी दोस्त की आवाज़ कानों में गूँज रही थी। हम चारों कॉलेज के पीछे वाले रास्ते से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे यही रास्ता हॉस्टल की तरफ़ जाता था, लेकिन हमें हॉस्टल नहीं मिला था। मजबूरी में कॉलेज से थोड़ी दूर पर ही एक छोटा कमरा किराए पर लिया था।
रास्ते से गुजरते हुए कई आवाज़ें आईं।
“ए… ज़रा इधर आओ।”
हमने सिर झुकाए रखा, बस कदम तेज़ कर दिए। धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि क्लास के गेट पर पहुँचने तक लगता रहा—शायद अभी किसी ने पकड़ ही लिया होगा। गेट के अंदर घुसे तो लगा जैसे साँस वापस लौटी हो।
हम देर से पहुँचे थे, टीचर ने घूरकर हमें अंदर आने का इशारा किया। पूरा क्लास हमें घूर रहा था—जैसे हम कोई एलियन हों। हम चुपचाप सबसे आगे जाकर बैठ गए।
क्लास ख़त्म होते ही एक लड़का उठा, दरवाज़ा बंद किया और हमारी तरफ़ आते हुए बोला—
“तो… तुम लोग ही हो नए स्टूडेंट?”
उसके लहज़े में तंज़ था, जैसे हम किसी दूसरे देश से बगैर पासपोर्ट घुस आए हों। हम चारों ने एक-एक कर अपना परिचय दिया और चुपचाप वापस बैठ गए। उसी दिन समझ में आ गया कि यह क्लास हमें इतनी आसानी से अपनाने वाली नहीं है।
धीरे-धीरे हमें क्लास का नक्शा समझ आने लगा। आगे की बेंच पर गाँव से आए बच्चे थे—मेहनती, होशियार, लेकिन ग़रीब। बीच में मध्यम वर्ग के बच्चे—नोट्स शेयर करने वाले, दोस्त बनाने वाले। और आख़िरी बेंच पर वो रईसजादे—जो बड़े स्कूलों से आए थे और attitude उनका बेजोड़ था।
शुरुआती दिनों में हम हमेशा समूह में ही चलते। डर इतना था कि अकेले जाना नामुमकिन लगता। लेकिन एक दिन गलती से मैं भीड़ से अलग हो गया… और पकड़ा गया।
“गाना गा!”
“सात पुशअप्स लगा… नहीं तो थप्पड़ पड़ेगा।”
थप्पड़, गालियाँ, बेहूदा सवाल। कानों में सन्नाटा गूँज रहा था और आँखों के सामने अंधेरा। उस दिन लगा—शायद यही परिचय कहलाता है।
लेकिन धीरे-धीरे हालात बदले। वही क्लास जिसने हमें पजामा छाप कहा था, वहीं से दोस्त भी मिले। लाइब्रेरी में नोट्स के बहाने बातचीत शुरू हुई, फिर कैंटीन की चाय और समोसे पर हँसी-ठहाके जुड़ गए।
सबसे यादगार पल था cultural fest। हमें group dance करना था, लेकिन हमने प्रैक्टिस की बजाय बस हँसी-मज़ाक किया। स्टेज पर पहुँचते ही सारे steps गड़बड़ा गए, पर ऑडियंस ने इतनी तालियाँ बजाईं कि हमें लगा—गलतियाँ भी applause कमा सकती हैं।
वक़्त के साथ यह समझ आया कि कॉलेज किसी छोटे समाज जैसा है। यहाँ भी दो तरह के लोग होते हैं—बुली करने वाले और चुपचाप सहने वाले। फर्क बस इतना है कि कॉलेज की गलियाँ और क्लासरूम की हदें आज के समय में सोशल मीडिया तक फैल गई हैं। वहाँ भी वही पैटर्न है—या तो कोई किसी को नीचा दिखा रहा है, या फिर कोई चुपचाप झेल रहा है।
लेकिन कॉलेज ने हमें एक बात ज़रूर सिखाई—डर और मस्ती, दोनों का हिस्सा बनना है। कभी सिर झुकाकर निकल जाना, कभी दोस्तों के साथ ठहाके लगाना। और शायद ज़िंदगी भी यही है—न लेफ़्ट, न राइट, बस अपनी मंज़िल की ओर… दोस्तों के साथ मुस्कुराते हुए।
