छुट्टियाँ शुरू होते ही अगर मंजू बुआ हमारे घर चली आतीं, तो मानो पूरे घर में रौनक लौट आती थी।

बुआ के आने की खबर जैसे ही मिलती, हम सब बच्चे उछल पड़ते — जैसे किसी त्योहार की घंटी बज उठी हो।

उन दिनों माँ-पापा से कोई चीज़ माँगना बड़ी बात होती थी, मगर बुआ तो बिना माँगे ही खज़ाना खोल देतीं।

उनके हाथों से बुने हुए स्वेटर और दस्ताने आज भी याद आते हैं — जैसे उनमें उनके प्यार की गर्माहट आज भी समाई हो।

तब न ब्रांड का चक्कर था, न रेडीमेड कपड़ों का चलन।

हर ऊन के धागे में बुआ का स्नेह, उनकी ममता, और हमारा इंतज़ार बुना होता था।

हम सब बेसब्री से सोचते रहते — “कब हमारा स्वेटर तैयार होगा!” और बुआ मुस्कुराकर कहतीं, “थोड़ा सब्र करो, प्यार से बुना जा रहा है।”—

एक बार छुट्टियों में हमने ऐलान कर दिया —

“इस बार तो हम नेहरू पार्क ही जाएंगे!”

नेहरू पार्क इलाहाबाद के दूसरे सिरे पर, सुलेम सराय और धूमनगंज के पास था — हमारे कल्याणी देवी वाले घर से बहुत दूर।

समस्या ये थी कि अगर रिक्शे से जाएँ तो वापस लौटने का रिक्शा मिलना मुश्किल।

उन दिनों कार या टैक्सी के बारे में सोचना भी सपना ही लगता था।

हम सबको जाने के लिए दो रिक्शों की ज़रूरत पड़ती, और पूरा दिन का रिक्शा करना अलग झंझट था।

फिर भी, नेहरू पार्क की चमक दिल में बस गई थी।

उन दिनों न सोशल मीडिया था, न टीवी पर कोई विज्ञापन — बस लोगों की बातों में सुन रखा था कि वहाँ झील है, नावें हैं, फव्वारे हैं, और वो जगह किसी फिल्म के सीन जैसी सुंदर लगती है।

माँ ने समझाने की कोशिश की —

“अरे, पास का हाथी पार्क या फिर भद्रवाज पार्क चल लो, जाना-आना आसान रहेगा।”

पर हम बच्चों ने तो ज़िद ठान ली थी — नेहरू पार्क ही जाएंगे!

बुआ हमेशा की तरह मुस्कुराईं — “ठीक है, देखते हैं कुछ इंतज़ाम करते हैं।”

फिर सब बैठकर योजना बनी — कैसे जाएँ, कौन सा रास्ता लें।

कल्याणी देवी पार्क के पास एक स्कूल वाला रिक्शा खड़ा दिखा तो बुआ ने उससे कहा,

“शनिवार को नेहरू पार्क चलना है, पूरा दिन का लगेगा।”

रिक्शेवाले साधु ने थोड़ी देर सोचा, फिर बोला — “ठीक है माजी, मैं चलूँगा।”

हम सब बच्चों की खुशी का ठिकाना ही नहीं था —

“वाह! अब तो हम सब एक साथ एक ही रिक्शे में जाएंगे, रास्ते में अंताक्षरी खेलेंगे!”

उन दिनों न किसी को तस्वीरें खींचनी होती थीं, न सोशल मीडिया पर दिखाना होता था कि कौन कहाँ गया — बस एक सच्ची, बेफिक्री वाली खुशी होती थी कि हम नेहरू पार्क जा रहे हैं।

कल्याणी देवी से धूमनगंज और सुलेम सराय तक पहुँचना तब पूरे इलाहाबाद का चक्कर लगाने जैसा था, लेकिन उस समय ट्रैफिक कम था और दिलों में उत्साह बहुत ज़्यादा।

शनिवार की वो सुबह आज भी याद है।

माँ ने गरम-गरम पुरियाँ तल ली थीं — “वहाँ जाकर खाएँगे!”

और हम सब — बुआ, माँ, और हम बच्चे — स्कूल वाले रिक्शे पर चढ़ गए।

रास्ते में शुरुआत में तो खूब मज़ा आया, हवा बालों में लहराती थी, बुआ हमसे बातें करती रहीं।

पर थोड़ी देर बाद जब लोग स्कूल के रिक्शे में हमें इस तरह बैठे देख मुस्कुरा रहे थे, तो हमें थोड़ा अजीब लगा।

लेकिन जैसे ही नेहरू पार्क पहुँचे — सब थकान पल में गायब!

वो जगह तो सच में सपनों जैसी थी —

हरी-भरी घास, फव्वारे, झील का किनारा, और नावें…

हम सब बच्चों की आँखें चमक उठीं।

नाव में बैठे, भागे, हँसे — और दिल में बस यही खयाल था,

“काश, ये दिन यहीं रुक जाए।”

उस वक्त हमारे लिए नेहरू पार्क ही अप्पू घर और एस्सेल वर्ल्ड था।


थोड़ी देर बाद सब बोले — “बुआ, आइसक्रीम खानी है!”

बुआ ने सबकी पसंद की आइसक्रीम दिलाई — यहाँ तक कि साधु रिक्शेवाले को भी।

जब बुआ ने अपने लिए बड़ी डिब्बी वाली आइसक्रीम ली, तो हम हँस पड़े —

“अरे बुआ, आपने तो बड़ी वाली ले ली!”

बुआ खिलखिलाकर बोलीं,

“मैंने तो कहा था जो मन हो ले लो — अब तुमने छोटी ली, तो मैं क्या करूँ!”

उनकी वो मुस्कान आज भी मन के किसी कोने में रोशनी सी फैला देती है।


साधु बोला, “माजी, आप लोग घूम लो, मैं बाहर ही मिल जाऊँगा।”

उन दिनों न कार पार्किंग का झंझट था, न मोबाइल पर कैब ढूँढने का झंझट।

बुआ ने उसे टिकट पकड़ाते हुए कहा, “अरे अंदर आ जाओ, पार्क देखो, मन करे तो घूम लेना।”

साधु ने झिझकते हुए टिकट तो ले ली, पर वो बाहर ही बैठा रहा।


शाम ढलते-ढलते जब पार्क की बत्तियाँ जल उठीं, तो बुआ ने कहा —

“चलो, अब लौटते वक्त बाहर ही खाना खाते हैं।”

हम बच्चों की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा!

स्टेशन के पास पहुँचे तो ‘शेर-ए-पंजाब रेस्टोरेंट’ नज़र आया।

हम सब वहाँ जा पहुँचे — हर किसी ने अपनी पसंद का खाना ऑर्डर किया।

तभी देखा, साधु बाहर ही बैठा है।

बुआ ने वेटर को बुलाया और कहा —

“उसे भी बुला लो, वो भी हमारे साथ है।”

हम थोड़े हैरान हुए, शायद थोड़ा असहज भी।

तब बुआ ने मुस्कुराते हुए कहा,

“बेटा, वो भी तो इंसान है, और आज उसने हमारे लिए कितना मेहनत की है।

इज़्जत इंसान को दी जाती है, उसके काम या कपड़ों को नहीं।”

तब शायद वो बात पूरी तरह समझ नहीं आई थी,

पर आज जब सोचता हूँ, तो लगता है — बुआ ने हमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया था।

घर लौटते वक्त बुआ ने साधु को थोड़े ज़्यादा पैसे दिए।

उसकी आँखें भर आईं।

वो सफ़र, वो सादगी, बुआ का स्नेह, माँ की पुरी की खुशबू, और रिक्शे की खड़खड़ाहट —

सब आज भी दिल में उतना ही ज़िंदा है,

जितना उस दिन था…