परदादाजी
हम सारे बच्चे हमेशा की तरह गर्मियों की छुट्टियों में अपने कल्याणी देवी वाले घर के बाहर खिलखिलाते हुए खेल रहे थे। धूप तेज थी, पर हमारे चेहरे पर मासूम खुशी की ठंडक थी। तभी अचानक हमारी नज़र घर के बाहर खड़े दो अजीब से लोगों पर पड़ी।
एक बाबा भगवा कपड़ों में थे, कंधे पर बड़ा सा झोला लटकाए हुए… चेहरा शांत, पर रहस्यमयी। उनके साथ एक और बाबा थे, बिल्कुल सफेद कपड़ों में, जैसे कोई साधु-संत। उसी वक्त मम्मी घर के गेट पर खड़ी सब्ज़ी वाले से सब्ज़ियाँ खरीद रही थीं।
भगवा कपड़ों वाले बाबा ने धीरे से मम्मी से कहा, “माँ, कुछ खाने को मिल जाएगा क्या?”
मम्मी का दिल तो हमेशा से ही नरम था। उन्होंने मुझे आवाज़ दी, “बेटा, अंदर से कुछ रोटियाँ ले आओ।”
मैं जैसे ही रोटियाँ लेकर बाहर आया, मैंने देखा कि सफेद कपड़ों वाले बाबा दूसरे बाबा की महिमा का गुणगान कर रहे थे—
“ये बाबा तो कभी किसी से कुछ नहीं माँगते… बहुत बड़े संत हैं… आपके हाथों में बहुत पुण्य है।”
बाबा यहीं नहीं रुके, मम्मी को देखकर भूत-भविष्य सब बताने लगे। बगल वाले बाबा बस यही बोलते कि अरे बाबा ऐसे किसी को कुछ नहीं बताते, यहाँ जरूर कुछ बात है, आपके अंदर देवी है। कुछ बातें तो सच में अजीब थीं पर कुछ वही पुराने फंडे कि आप दूसरों के लिए तो बहुत करती हैं पर कुछ मिलता नहीं है। किसी बुरी औरत का साया है और ना जाने क्या-क्या।
जैसे कि सब लोगों के साथ होता है।
मम्मी अपनी तारीफ़ सुनकर खुश हो गईं। उन्होंने रोटियों के साथ 5 रुपये भी देने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी अचानक बाबा जी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा—
“अरे… ये बच्चा तो आपका दादिया ससुर है… पिछले जन्म में आपके परदादा थे!”
ये बात सुनकर मुझे लगा ये क्या बकवास है।
उनके ये शब्द जैसे हवा में ठहर गए। वहाँ मौजूद हर एक इंसान मुझे अजीब नज़रों से देखने लगा।
लेकिन बाबा जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने मेरे “पिछले जन्म” की ऐसी-ऐसी कहानियाँ सुनानी शुरू कर दीं, जिनके बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं था। मम्मी पूरी तरह से उनकी बातों में खो गईं। आखिर में उन्होंने 100 रुपये की दक्षिणा दी, उनके पैर छुए और उन्हें विदा किया।
बाबा जी की वाणी थी कि इस बच्चे का ध्यान रखना।
बाबा जी तो चले गए…
लेकिन मेरी जिंदगी वहीं से बदल गई।
मम्मी की डाँट-फटकार तो जैसे हमेशा के लिए खत्म हो गई। घर के छोटे-मोटे काम भी मुझसे करवाना बंद हो गया। बुआ लोग भी अक्सर मेरे “पिछले जन्म” की कहानियाँ सुनाकर मुझे खास महसूस करातीं।
पापा ही थे जिन्हें इन सब बातों में कोई यकीन नहीं था और वो मम्मी को अक्सर बोलते भी रहते कि इन सब बकवास में मत पड़ो और इसकी अय्याशी बंद करो।
जिंदगी मज़े में बहने लगी… मैंने वैसे जानबूझकर तो कोई फायदा नहीं उठाया पर कभी-कभी
कभी कोई नया खिलौना, कभी कोई गिफ्ट…
कुछ भी मांगो, बिना किसी सवाल के पूरा!
अब तो बस इतना कहना होता—
“आज मेरा मन आइसक्रीम खाने का है…”
और सामने कुल्फी हाज़िर।
मेरे भाई-बहनों को मेरी इस “पदोन्नति” से जलन तो बहुत होती थी, पर चालाकी से वो भी अपने काम मुझसे ही निकलवा लेते।
पापा-मम्मी कई बार गुस्से में दिखते, लेकिन जैसे किसी अदृश्य बंधन में बंधे हों—कुछ कर ही नहीं पाते।
हर दिन मैं मन ही मन उस बाबा जी को धन्यवाद देता…
जिंदगी सच में सपने जैसी लगने लगी थी।
करीब 6 महीने बाद, हम सब मिर्मफोदगंज में मौसी के घर गए हुए थे। सारे बच्चे बाहर खेल रहे थे कि तभी… फिर से वही दो बाबा आ गए।
उनकी बातें सुनकर मेरे दिल में एक अजीब सी हलचल हुई…
“ये तो वही कहानी है… वही शब्द… वही अंदाज़…”
और फिर… उन्होंने मेरे कज़िन को भी मौसी का “दादिया ससुर” बता दिया!
मौसी ने जोर से मम्मी को बुलाया और हँसते हुए कहा—
“लो, एक और ससुर जी का जन्म हो गया!”
पापा की बात सच निकली, वो बाबा लोगों की एक ऐसी तरकीब थी जो ना जाने कब से चली आ रही थी और मम्मी उसमें फँस गई थीं।
उस पल… मम्मी की नज़रें बाबा से ज्यादा मुझ पर थीं।
मेरी सारी “स्पेशल सुविधाएँ” एक झटके में खत्म हो गईं।
और मेरे भाई-बहन…
काफी दिनों तक मुझे “परदादाजी” कहकर चिढ़ाते रहे।