ओमकार नाथ वर्मा — यही नाम था उसका।

पूरे छह फुट की ऊँचाई, लंबा-चौड़ा शरीर। उसे देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह ग्यारहवीं का छात्र है। पहली बार जब वह हमारी क्लास में दाखिल हुआ, तो पूरी कक्षा उसे नया टीचर समझकर खड़ी हो गई। वह हल्का-सा मुस्कुराया, बिना कुछ कहे मेरी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया।

हमारा जमुना क्रिश्चियन स्कूल इतना भी मशहूर नहीं था कि लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर से पढ़ने आएँ। लेकिन वह आया था—बिहार के गोपालगंज से।

वह मेरे पड़ोस में रहने वाले अनिल चाचा के मकान में किराए पर रहता था। अनिल चाचा का घर किसी छोटे-से बॉयज़ हॉस्टल जैसा था। छोटे-छोटे कमरे… एक चारपाई, एक मेज़, एक कुर्सी, एक स्टोव… और वही किसी सोलह-सत्रह साल के लड़के का पूरा संसार।

मुझे हमेशा हैरानी होती थी कि कोई अपना घर छोड़कर कैसे चला आता होगा। कैसे माँ के हाथ का खाना, पिता की डाँट, भाई-बहनों की लड़ाई, मोहल्ले की गलियाँ… सब पीछे छोड़कर एक अजनबी शहर के एक कमरे में रहना सीख लेता होगा।

शायद उसी सवाल ने मुझे उसका दोस्त बना दिया।

एक दिन पापा ने उसे देखा और हँसते हुए बोले,

“अरे, ये तो तुमसे भी बड़ा लगता है। अभी तक ग्यारहवीं में कैसे है? कहीं बिहार से फेल होकर तो नहीं आया?”

मैंने भी एक दिन उससे पूछ ही लिया,

“यार, इतनी दूर यहाँ क्यों आए?”

वह बोला,

“गोपालगंज में मैं दसवीं का स्कूल टॉपर था। लेकिन वहाँ पढ़ाई का माहौल अच्छा नहीं था। हर तरफ बाहुबली राजनीति का असर था। पापा चाहते थे कि मैं कुछ बनूँ… इसलिए यहाँ भेज दिया। अब ग्रेजुएशन तक यहीं रहना है।”

उसने बताया कि उसके पिताजी भी कभी इसी कॉलेज में पढ़े थे। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और सरकारी नौकरी में चले गए।

वह मुस्कुराते हुए बोला,

“हमारे यहाँ अगर माँ-बाप की औकात होती है, तो बच्चों को इलाहाबाद भेज देते हैं। सपना बस एक होता है—अच्छी पढ़ाई… और सरकारी नौकरी।”

इतना कहते-कहते उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

चेहरे पर मुस्कान थी… लेकिन आँखें भर आई थीं।

शायद पहली बार मैंने समझा कि घर छोड़ने का दर्द कैसा होता है। कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें लोग रोकर नहीं, मुस्कुराकर छिपाते हैं।

उस दिन पहली बार मुझे अपने शहर से प्यार हुआ।

जिस इलाहाबाद को मैं रोज़ देखता था, जिसकी गलियों से ऊब चुका था, वही किसी के लिए सपना था। जो घर मुझे हमेशा से मिला हुआ था, वही किसी दूसरे के लिए सबसे बड़ी कमी था।

जब भी उसे अपने हाथ से खाना बनाते, चाय चढ़ाते या बाल्टी में कपड़े धोते देखता, तो घर आकर माँ को बिना वजह गले लगा लेता।

तब पहली बार समझ आया कि माँ सिर्फ़ खाना नहीं बनातीं… वे हमारी आधी ज़िंदगी आसान बना देती हैं। और हमें इसका एहसास तब होता है, जब किसी और को वह सब अकेले करते देखते हैं।

धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती गई।

घर में सब उसे “अखिल का बिहारी दोस्त” कहते थे।

स्कूल में भी उसका नाम “बिहारी” ही पड़ गया था।

मैंने कई बार कहा,

“यार, लोगों से कह दिया करो कि तुम्हारा नाम ओमकार है।”

वह बस हँस देता।

शायद उसे आदत हो गई थी।

या शायद उसने अपनी पहचान से समझौता करना सीख लिया था।


एक दिन स्कूल से लौटते समय उसकी साइकिल से एक लड़के को हल्की-सी टक्कर लग गई। मैं पीछे बैठा था।

वह लड़का आया… और बिना कुछ पूछे ओमकार के गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मार दिया।

ओमकार चुपचाप खड़ा रहा।

मैं भीतर तक जल गया।

बाद में मैंने पूछा,

“यार, तुमने वापस मारा क्यों नहीं? तुम तो उससे दुगने बड़े हो।”

वह कुछ देर चुप रहा।

फिर बहुत धीरे से बोला,

“जाने दो… इन सबसे क्या मिलेगा? वैसे भी मैं यहाँ बाहर से आया हूँ।”

फिर थोड़ी देर बाद बोला,

“एक परदेसी को सिर झुकाकर चलना सीखना पड़ता है। यह शहर मेरा नहीं है। कल अगर मेरे साथ कुछ हो गया… तो मेरे अपने यहाँ कौन हैं? और फिर… मैं यहाँ लड़ने नहीं आया हूँ। मैं यहाँ अपने माँ-बाप का सपना पूरा करने आया हूँ।”

उस दिन पहली बार मुझे समझ आया कि प्रवासी होना सिर्फ़ शहर बदलना नहीं होता।

कभी-कभी आदमी अपना गुस्सा, अपना हक़, यहाँ तक कि अपनी आवाज़ भी पीछे छोड़ आता है।


समय निकल गया।

बारहवीं का रिज़ल्ट आया।

मुझे फ़र्स्ट डिवीज़न मिली।

कुछ अंकों से उसकी सेकंड डिवीज़न रह गई।

मैं जानता था कि वह अपने नंबरों से नहीं हारा था… वह उस अकेलेपन से लड़ रहा था जिसे कोई मार्कशीट नहीं समझ सकती।

मैंने पूछा,

“घर नहीं जाओगे?”

वह बोला,

“पहले ग्रेजुएशन में एडमिशन ले लूँ। अभी गया तो दाख़िला छूट जाएगा।”

मुझे आज भी याद है…

उसने यह नहीं कहा कि उसे घर की याद नहीं आती।

शायद इसलिए नहीं कहा क्योंकि अगर वह यह मान लेता… तो शायद उसी दिन रो पड़ता।

कुछ दिनों बाद वह यूनिवर्सिटी रोड रहने चला गया।

फिर ज़िंदगी अपने-अपने रास्ते निकल गई।

उन दिनों न मोबाइल थे…

न सोशल मीडिया…

और कुछ रिश्ते बस चिट्ठी न लिख पाने की वजह से हमेशा के लिए छूट जाते थे।


सालों बाद…

दिल्ली जाने वाली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में अपनी सीट खोजते-खोजते सामने नज़र गई…

और मैं ठिठक गया।

सामने ओमकार बैठा था।

मैं अनायास बोल पड़ा,

“अरे बिहारी…!”

उसने सिर उठाया…

पहले दो सेकंड मुझे देखा…

फिर उसी पुरानी मुस्कान के साथ खड़ा हो गया।

हम दोनों बदल चुके थे।

लेकिन कुछ रिश्ते उम्र से नहीं बदलते।

वह अब जिया सराय में रहकर IAS की तैयारी कर रहा था।

साथ ही एक सरकारी नौकरी के इंटरव्यू में भी चुन लिया गया था।

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“घर में तो बहुत खुशी होगी। आखिर जिसके लिए तुमने इतना कुछ छोड़ा… वह सपना पूरा होने वाला है।”

वह खिड़की के बाहर देखने लगा।

ट्रेन इलाहाबाद को पीछे छोड़ रही थी।

पेड़ पीछे भाग रहे थे…

स्टेशन पीछे छूट रहे थे…

जैसे ज़िंदगी भी पीछे छूटती चली जाती है।

बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोला।

फिर धीमे से कहा,

“जानते हो… शहर बदलने से ज़्यादा दर्द तब होता है, जब वापस आओ और अपना ही शहर बदल चुका हो।”

मैं चुप था।

वह आगे बोला,

“घर में अब कोई यार-दोस्त नहीं बचा। माँ चली गईं। भाई-बहन सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में निकल गए।”

फिर उसने एक लंबी साँस ली।

और एक वाक्य कहा…

जो आज भी मेरे भीतर कहीं गूँजता है।

“यार… मेरा घर तो दसवीं के बाद ही छूट गया था। बस… मुझे समझने में कई साल लग गए कि कुछ घर दोबारा कभी नहीं मिलते।”

उस दिन पहली बार मैंने उसकी आँखों में वह खालीपन देखा…

जो सिर्फ़ माँ के जाने के बाद आता है।


आज…

भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर…

जब भी इलाहाबाद लौटता हूँ…

तो उसकी कही बात याद आती है।

शहर आज भी वहीं है।

सड़कें भी वही हैं।

गंगा भी वैसी ही बहती है।

लेकिन वह इलाहाबाद…

जहाँ माँ दरवाज़े पर इंतज़ार करती थी…

जहाँ दोस्तों के लिए शाम कभी छोटी नहीं पड़ती थी…

जहाँ घर लौटना किसी उपलब्धि जैसा लगता था…

वह अब कहीं नहीं है।

शायद सच यही है…

इंसान अपना शहर नहीं छोड़ता।

वह धीरे-धीरे उन लोगों को खो देता है, जिनसे मिलकर कोई जगह “घर” कहलाती है।

और जिस दिन वे लोग नहीं रहते…

उसी दिन पता चलता है…

कि घर बहुत पहले छूट चुका था।