Loan
पाँच रुपये
सालों बाद अचानक Facebook पर एक बहुत पुराने दोस्त का मैसेज आया—
“कैसा है यार? कहाँ है आजकल? अपना नंबर देना।”
ऐसे मैसेज आपको एकदम वर्तमान से उठाकर सीधे आपके पुराने दिनों में ले जाते हैं।
मदन मेरा बचपन का दोस्त था। हम दोनों ने दसवीं तक जमुना क्रिश्चियन स्कूल में साथ पढ़ाई की थी। रोज़ स्कूल की प्रार्थना से लेकर क्लास तक साथ जाना और फिर पूरे दिन एक ही बेंच पर बैठे रहना—जैसे स्कूल की हर याद में हम दोनों साथ ही थे।
मदन पढ़ाई में बहुत तेज़ था। हाई स्कूल में भी उसके अच्छे नंबर आए थे। मुझे हमेशा लगता था कि वह आगे चलकर इंजीनियरिंग करेगा। पढ़ाई में वह इतना अच्छा था कि मुझे उसके भविष्य को लेकर कोई शक ही नहीं था।
लेकिन दसवीं के बाद अचानक उसने इंडियन एयर फ़ोर्स में एयरमैन बनने का फैसला कर लिया।
एयरमैन एक तकनीकी नौकरी होती है और दसवीं के बाद भी इसमें जाया जा सकता है। उस समय मुझे एयरमैन की नौकरी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। एयर फ़ोर्स सुनने में तो बहुत अच्छा लगता था, लेकिन मैंने हमेशा NDA के बारे में सुना था, जो बारहवीं के बाद दिया जाता था।
मुझे उसका इस तरह अचानक स्कूल छोड़ देना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।
एक दोस्त होने के नाते मैंने उसे बहुत समझाने की कोशिश की—
“यार, अभी पढ़ाई मत छोड़ो। तुम बहुत अच्छा कर सकते हो।”
लेकिन शायद उसने मन बना लिया था। घर की परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी थीं कि वह ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था।
और फिर एक दिन मदन चला गया।
बारहवीं की पढ़ाई वैसे भी इतनी आसान नहीं थी। कोचिंग और क्लास के बीच जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई कि धीरे-धीरे मदन मेरी जिंदगी से और फिर मेरी यादों से भी दूर होता गया।
वह नैनी में रहता था, इसलिए उसके घर जाना भी मुश्किल ही हो पाता था।
समय बीतता गया।
और एक समय ऐसा आया जब मैं उसे लगभग पूरी तरह भूल चुका था।
फिर सोशल मीडिया का दौर आया। ऐसा दौर, जब लोग अपने पुराने दोस्तों को फिर से ढूँढने लगे थे। मैंने भी Facebook पर मदन को ढूँढना शुरू किया।
मैं उसे नहीं ढूँढ पाया।
लेकिन शायद उसने मुझे ढूँढ लिया था।
एक दिन उसकी friend request आई। उसके प्रोफाइल पर न कोई पुरानी तस्वीर थी, न ज्यादा जानकारी। बस एक हवाई जहाज की तस्वीर लगी हुई थी।
मैंने सोचा—शायद यही होगा।
मैंने उसे कई मैसेज किए, लेकिन कभी कोई जवाब नहीं आया। धीरे-धीरे मैंने उसे कोई spam profile समझकर छोड़ दिया।
फिर अचानक उसका मैसेज आया।
मैं हैरान रह गया।
मैंने तुरंत अपना नंबर भेज दिया।
थोड़ी देर बाद उसका मैसेज आया—
“अरे, ये तो बाहर का नंबर है यार! तू कहाँ है आजकल?”
मैंने कहा—
“आयरलैंड में रहता हूँ।”
उसने कहा—
“चल, मैं WhatsApp पर मैसेज करता हूँ।”
और फिर शुरू हुआ WhatsApp का सिलसिला।
WhatsApp भी अपने आप में एक अलग ही सोशल मीडिया का जाल है।
पहले के जमाने में ISD कॉल का मतलब होता था—“भाई, बहुत जरूरी बात है, जल्दी करो, वरना बहुत पैसे लगेंगे।”
और अब WhatsApp ने ग्रुप कॉल से लेकर वीडियो कॉल तक सब कुछ इतना आसान कर दिया है कि कोई भी किसी भी समय फोन कर सकता है।
कभी-कभी कोई गलती से पूरे ग्रुप में कॉल कर देता है और आधा घंटा यह समझने में निकल जाता है कि आखिर कॉल किसने की थी।
जिंदगी आसान हुई है क्योंकि हम सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
लेकिन शायद सस्ता होने की वजह से हम जरूरत से कुछ ज्यादा ही जुड़े हुए हैं।
कभी कोई रात में फोन कर देता है और बात शुरू होने के बाद पूछता है—
“अरे, तुम्हारे यहाँ तो रात है! सो जाओ, बाद में बात करते हैं।”
यानी WhatsApp ने दूरी तो मिटा दी, लेकिन टाइम ज़ोन समझने की आदत भी शायद हमसे छीन ली।
मदन ने भी WhatsApp पर ढेर सारे मैसेज शुरू कर दिए।
सुबह की Good Morning।
दिन भर का ज्ञान।
Status पर Like।
छोटी-छोटी बातें।
और फिर एक दिन उसका एक अलग सा मैसेज आया—
“Hello यार, मुझे कुछ help चाहिए तुझसे।”
मैंने लिखा—
“हाँ, बताओ।”
काफी देर बाद उसका जवाब आया—
“मुझे ₹10,000 की सख्त जरूरत है। दे सकते हो?”
मैंने ज्यादा सोचे बिना कहा—
“हाँ, जरूर। अपना account number भेज दो।”
उसने मुझे QR code भेज दिया।
मैंने कहा—
“सॉरी यार, मुझे इंडिया के बाहर से transfer करना है। Account details भेज दो।”
उसने किसी अजीब से नाम का account भेजा।
शहर भी अलग था।
और अचानक मैं बिल्कुल शांत हो गया।
मैंने पूछा—
“मदन, तू इलाहाबाद में नहीं है? ये कौन सी जगह है और किसका account है?”
उसने कहा—
“अरे, किसी दोस्त का account है। Tax के लिए यही account use करना चाहता हूँ।”
मैंने कहा—
“मुझे थोड़ा time चाहिए।”
उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया।
मेरे मन में बार-बार fraud का ख्याल आ रहा था।
आखिर मदन से मिले हुए जमाना हो गया था।
मैं उसकी आवाज़ तक नहीं पहचानता था।
क्या पता ये सच में मदन हो भी या नहीं?
लेकिन फिर दूसरा ख्याल आता—
अगर ये सच में मदन है और उसे पैसों की जरूरत है, तो उसकी मदद न करना कितना गलत होगा?
मुझे स्कूल के दिन याद आने लगे।
मदन ने कितनी बार मेरी मदद की थी।
अपने notes दे देता था।
Maths की कोई problem होती तो स्कूल के बाद भी बैठकर समझाता था।
और न जाने क्यों, उसका बचपन वाला चेहरा पूरे दिन मेरी आँखों के सामने घूमता रहा।
Cyber fraud की खबरों और TV serials ने मेरे दिमाग में शक को इतना भर दिया था कि पैसे होने के बावजूद मैंने दो दिन तक उसे कोई जवाब नहीं दिया।
दो दिन बाद उसका फिर मैसेज आया—
“यार, अगर कुछ हो सकता है तो बताना।”
अब मैं दुविधा में था।
न दूँ?
या दे दूँ?
फिर सोचा—
₹10,000 तो दे ही सकता हूँ।
और मैंने उसे पैसे transfer कर दिए।
Screenshot भेज दिया।
उसने कहा कि एक हफ्ते में वापस कर देगा।
एक हफ्ते बाद उसका मैसेज आया।
मुझे लगा अब शायद account number माँगेगा।
लेकिन उसने लिखा—
“यार, मुझे थोड़े पैसे और चाहिए होंगे।”
मैंने पूछा—
“कितने?”
इस बार जवाब आया—
“₹30,000।”
पैसे मेरे account में थे।
लेकिन मैंने कहा—
“मुझे थोड़ा time चाहिए होगा।”
उसने तुरंत पूछा—
“कितना time?”
उसका इस तरह पूछना मुझे थोड़ा अजीब लगा।
मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ।
मन कहता था—कहीं ये fraud न हो।
दूसरा मन कहता था—अगर दोस्त की मदद नहीं की तो इतने पैसे होने का फायदा ही क्या है?
मुझे अपने जीवन का एक पुराना समय याद आ गया।
एक समय ऐसा भी आया था जब मेरे पिता अस्पताल में थे। पैसे पानी की तरह खर्च हो रहे थे। मुझ पर loan हो गया था।
उस समय मुझे अंदर से उम्मीद थी कि कोई दोस्त या रिश्तेदार बस इतना पूछ ले—
“कोई मदद चाहिए?”
लेकिन कोई नहीं आया।
न मैंने किसी के सामने हाथ फैलाया।
लेकिन उस समय का दर्द कहीं अंदर रह गया था।
शायद इसलिए मुझे लग रहा था कि मदन भी किसी बहुत बड़ी मजबूरी में होगा।
आखिर इतने सालों बाद कोई दोस्त अचानक पैसे क्यों माँगेगा?
मैंने अपनी पत्नी नेहा से पूछा।
उसने कहा—
“दे दो। लेकिन एक बार उससे video call कर लो। तुम्हारे मन की शंका भी दूर हो जाएगी।”
सही बात थी।
मैंने उसे बचपन में देखा था।
अब इतने सालों बाद वह कैसा दिखता होगा, कौन जानता था?
फिर भी मैंने मदन को मैसेज किया—
“मैं तुमसे video call पर बात करना चाहता हूँ।”
उसका पूरी रात कोई जवाब नहीं आया।
मुझे लगा—
शायद सच में fraud था।
लेकिन सुबह-सुबह उसका जवाब आया—
“हाँ, अभी बात कर सकते हैं।”
अब मेरी धड़कन और तेज थी।
सोच रहा था, video call पर आखिर बात क्या करूँगा?
फिर भी थोड़ी हिचकिचाहट के साथ मैंने call कर दिया।
स्क्रीन पर एक आदमी था।
ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गाँव में हो।
घर की दीवारों पर plaster नहीं था।
छत भी कुछ कच्ची सी लग रही थी।
उसने हँसते हुए कहा—
“चल, इसी बहाने तूने phone तो किया।”
मैंने कहा—
“नहीं यार, सच कहूँ तो आजकल इतने fraud होते हैं कि बस check कर रहा था।”
वह जोर से हँसने लगा।
फिर बोला—
“तू मुझे fraud बोल रहा है? लगता है स्कूल के दिन भूल गया जब मैं ही तुझे यादव के छोले खिलाया करता था!”
और बस…
उसकी वही बातें सुनकर मेरे सारे शक खत्म हो गए।
ये मदन ही था।
वही मेरा बचपन वाला मदन।
वही दोस्त।
वही इंसान जिसके साथ मैंने स्कूल की बेंच बाँटी थी।
Call खत्म होने के बाद मैंने उसे ₹30,000 भी transfer कर दिए।
इसके बाद धीरे-धीरे उसने तीन-चार बार थोड़े-थोड़े पैसे माँगे और देखते ही देखते कुल रकम ₹1 लाख तक पहुँच गई।
ऐसा भी नहीं था कि उसे याद नहीं था।
आखिरी बार पैसे माँगते हुए उसने खुद कहा—
“भाई, तेरे एक लाख हो जाएँगे। अगले महीने वापस कर दूँगा।”
लेकिन फिर दो महीने बीते।
तीन महीने बीते।
उसके messages और calls बिल्कुल बंद हो गए।
मैं पैसे देते-देते थक चुका था।
अब मुझे लगभग यकीन हो गया था कि ये पैसे वापस नहीं आएँगे।
लेकिन मैंने खुद को समझाया—
“चलो छोड़ो। अब माँगेगा तो नहीं दूँगा।”
करीब तीन महीने बाद मेरे स्कूल के एक और दोस्त मनोज का फोन आया।
कुछ job referral की बात हो रही थी।
बातों-बातों में उसने कहा—
“मदन से मेरी बात हुई थी।”
मेरे दिमाग में अचानक जैसे कोई घंटी बजी।
मैंने तुरंत पूछा—
“क्या तुमसे भी उसने पैसे माँगे?”
वह एकदम शांत हो गया।
कुछ सेकंड बाद बोला—
“हाँ… क्यों? तुमसे भी लिए हैं क्या?”
उस एक सवाल ने जैसे सब कुछ साफ कर दिया।
हम दोनों समझ गए कि कुछ गड़बड़ है।
धीरे-धीरे पता चला कि मदन ने कई पुराने दोस्तों से पैसे लिए थे।
किसी ने कहा कि वह online loans में फँस गया था।
किसी ने कहा कि शायद online gaming में बहुत पैसे हार चुका था।
सच्चाई क्या थी, हममें से किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था।
लेकिन एक बात हम सबने तय कर ली—
अब उसे और पैसे नहीं देने हैं।
मैंने उसका नंबर block कर दिया।
Facebook पर उसका एक message पड़ा हुआ था।
मैंने उसे देखा…
लेकिन जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके बाद सबसे ज्यादा जो बात मुझे परेशान करती रही, वह एक लाख रुपये नहीं थे।
मुझे बचपन का एक दिन याद आता रहा।
एक बार स्कूल में मेरी फीस के पाँच रुपये गिर गए थे। मैं डर के मारे रो रहा था।
मदन ने अपने पाँच रुपये मुझे दे दिए थे।
मैंने वो पाँच रुपये कभी वापस नहीं किए।
घर पर बता नहीं पाया था कि पैसे गिर गए हैं और मदन ने कभी माँगे भी नहीं।
कई बार सोचा कि उसे वापस कर दूँ, लेकिन बात कभी बनी नहीं।
और आज, इतने साल बाद, जब मैंने उसे एक लाख रुपये दिए तो मेरे मन ने कहा—
“चल यार… पाँच रुपये का कर्ज़ तो चुका दिया।”
लेकिन शायद मैं गलत था।
क्योंकि कर्ज़ पाँच रुपये का था ही नहीं।
कर्ज़ तो उस दोस्ती का था, जो बचपन में बिना हिसाब-किताब के मिली थी।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ नहीं आता कि मदन ने मेरे साथ धोखा किया था या वह खुद किसी ऐसी परेशानी में फँसा था, जिससे निकल नहीं पाया।
शायद मैं कभी जान भी नहीं पाऊँगा।